Saturday, 16 November 2013

अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते...

-> अगर कोई इन्सान बहुत हंसता या हंसाता है ,
तो अंदर से वो बहुत अकेला है ..
-> अगर कोई इन्सान बहुत सोता है , तो अंदर से
वो बहुत उदास है ..
-> अगर कोई इन्सान खुद को बहुत मजबूत दिखाता है
और रोता नही , तो वो -अंदर से बहुत कमजोर है ..
-> अगर कोई जरा जरा सी बात पर रो देता है
तो वो बहुत मासूम और नाजुक दिल का है ..
-> अगर कोई हर बात पर नाराज़ हो जाता है
तो वो अंदर से बहुत अकेला और जिन्दगी में प्यार
की कमी महसूस करता है ..
लोगों को समझने की कोशिश
कीजिये ,जिन्दगी किसी का इंतज़ार नही करती ,
लोगों को एहसास कराइए की वो आप के लिए कितने
खास हैं.

 अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते....
ना मिलता ग़म तो बर्बादी के अफसाने कहाँ जाते.....

Saturday, 16 February 2013

ऊर्जा क्या है प्रेम प्रेम को अनुभव किया जा सकता है, इसे शब्दों से व्यक्त करना संभव नहींहै। प्रेम के बिना मानव जीवन का कोई अर्थ नहीं। एक दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है प्रेम। मानव हृदय में प्रेम का स्रोत है। संसार में आकर वह भौतिकता से जकड़ जाता है, जिससे तमाम विकृतियों और विकारों के साथ अनेक समस्याओं के जाल में फंस जाता है। तब एकमात्र उपाय प्रेम ही रह जाता है समस्याओं से निजात पाने का। प्रभु का स्वरूप है प्रेम, इसका संबंध हृदय से है। प्रेम और भक्ति में जब समर्पण की भावना जुड़ जाती है तब एक शक्ति बनती है। जीवन के लिए संजीवनी है प्रेम। भक्तों के जीवन का आधार है प्रेम। प्रेम की प्रकृति आत्मा को प्रभावित करती है। यह मानव प्रवृत्ति एवं मानवता की प्रथम आवश्यकता है। सच्चा प्रेम अंतस की वाणी समझने में समर्थ है। निराशा के क्षणों में आशा की किरण है प्रेम, यह हमारे विश्वास को बल प्रदान करता है। हमारे प्रियजन हमसे कितनी ही दूर क्यों न हों, प्रेम की अनुभूति हमें उनकी निकटता देती है। प्रत्येक प्राणी को प्रेम की भूख है, चाहे वह मनुष्य हो या अन्य जीवधारी, सभी में प्रेम का प्रभाव समान होता है। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां मनुष्य जीवन की सभी व्यावहारिक वस्तुओं से संपन्न है वहां प्रेम से विपन्न है। यह मानव समाज के लिए विचार का विषय है। इन सबसे दूर रहकर हमें प्रेम पथ का विस्तार करना होगा। प्रेम परम आनंदमयी है। प्रेमी सर्वत्र आनंद का अनुभव करता है। सारा संसार आनंदस्वरूप है, सर्वत्र सौंदर्य और माधुर्य भरा हुआ है। दृश्य और दृष्टा, दोनों प्रेममय हैं। जिस भक्त के हप

ऊर्जा क्या है प्रेम प्रेम को अनुभव किया जा सकता है, इसे शब्दों से व्यक्त करना संभव नहींहै। प्रेम के बिना मानव जीवन का कोई अर्थ नहीं। एक दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है प्रेम। मानव हृदय में प्रेम का स्रोत है। संसार में आकर वह भौतिकता से जकड़ जाता है, जिससे तमाम विकृतियों और विकारों के साथ अनेक समस्याओं के जाल में फंस जाता है। तब एकमात्र उपाय प्रेम ही रह जाता है समस्याओं से निजात पाने का। प्रभु का स्वरूप है प्रेम, इसका संबंध हृदय से है। प्रेम और भक्ति में जब समर्पण की भावना जुड़ जाती है तब एक शक्ति बनती है। जीवन के लिए संजीवनी है प्रेम। भक्तों के जीवन का आधार है प्रेम। प्रेम की प्रकृति आत्मा को प्रभावित करती है। यह मानव प्रवृत्ति एवं मानवता की प्रथम आवश्यकता है। सच्चा प्रेम अंतस की वाणी समझने में समर्थ है। निराशा के क्षणों में आशा की किरण है प्रेम, यह हमारे विश्वास को बल प्रदान करता है। हमारे प्रियजन हमसे कितनी ही दूर क्यों न हों, प्रेम की अनुभूति हमें उनकी निकटता देती है। प्रत्येक प्राणी को प्रेम की भूख है, चाहे वह मनुष्य हो या अन्य जीवधारी, सभी में प्रेम का प्रभाव समान होता है। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां मनुष्य जीवन की सभी व्यावहारिक वस्तुओं से संपन्न है वहां प्रेम से विपन्न है। यह मानव समाज के लिए विचार का विषय है। इन सबसे दूर रहकर हमें प्रेम पथ का विस्तार करना होगा। प्रेम परम आनंदमयी है। प्रेमी सर्वत्र आनंद का अनुभव करता है। सारा संसार आनंदस्वरूप है, सर्वत्र सौंदर्य और माधुर्य भरा हुआ है। दृश्य और दृष्टा, दोनों प्रेममय हैं। जिस भक्त के हृदय में परब्रंा परमात्मा पूर्णरूपेण विराजमान हों, वहां फिर राग-द्वेष का स्थान नहीं रह जाता। प्रेम के परम व दिव्य स्वरूप दर्शन के लिए मन को विषयों से दूर रखना अपरिहार्य है। इसके आगे समस्त सांसारिकता बौनी प्रतीत होती है। अनन्य भक्ति और परम प्रेम ही वास्तव में अमृत स्वरूप है। प्रेम का प्रभाव हृदय को प्रभावित करता है, यदि हमारा वास्तविक प्रेम परमात्मा के प्रति हो गया तो जीवन सफल है। सदाचार और सद्गुण प्रेम भाव के पोषक हैं।