Monday, 6 February 2012

सब की जुबा पर एक ही राग है...........

सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है ?
कोई गरीबी को रोता है
तो किसी ने नेता को कोसा है
कोई चीखता कानून पे
तो कोई गुंडागर्दी पे भड़कता है .

कोई मुझे एक बात बताये ...
अपने गिरेबान में झाँक के आये ...

कितनों ने अँधेरे झोपड़ों में
दीपक जलाए ?
कितनों ने सड़क पे घूमते
फटेहाल बच्चों को
पाठशाला के रस्ते बताये ?
कितनों ने एक वक्त की
थाली किसी भूखे को खिलाई ?

ऊँगली उठाते हैं देश के विकास पर ?
बराबरी करते हैं अमरीका से ?
बात करते हैं बच्चों के संस्कारों की ?

उँगलियों पे जरा वो गिन के बता दें
देश के विकास में कितने काम कर दिखाए ?
अमेरिकन जैसा ईमानदारी से
कितने टैक्स भर पाए ?
अपने बच्चों को कितना
देशभक्ति का पाठ पढा पाए ?

विकास की बात आती है
जब अपने देश की तो
लायक होते ही अपने बच्चों को
कमाने के लिए
विदेशों की तरक्की का
पहिया बना देते हैं .
खुद का बुढापा चाहे दुख में बीते
हरे नोटों की चमक में
मगर जी ललचाता है .
और बड़े गर्व से कहते हैं
हमारे बच्चे विदेश में रहते हैं.

आज के बच्चों को पता नहीं
राम -सीता कौन थे ?
और महाभारत में पांडव कौन थे..?

उन्हें पता नहीं राष्ट्र पिता कौन हैं ?
आजादी किसको कहते हैं
और आजादी के दीवाने कौन हैं ?

हमारा राष्ट्रीय गान क्या है ?
कितनी बार जय हो जय हो
का घोष होता है
और कितनी नदियों के
नाम आते हैं ?

हर माता पिता फौज में
भेजने की बजाये
विदेश भेजना पसंद करते हैं ...
तो कैसे बात करते हैं
देश में कानून की ?
किसको फ़िक्र है
देश की सुरक्षा की ?
किसे चिंता है
भ्रष्ट नेता को
पर्दाफ़ाश करने की ?

बस रोना सभी रोते हैं
फिर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
और चैन की नींद सोते हैं.
सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है .

‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से... रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से... अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से... फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’


 बचपन से ही सुनते आए हैं कि देश की सबसे खूबसूरत इमारत ‘ताजमहल’ को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया है। स्कूल किताबें हों या समाचार-पत्रों के पन्ने, हर जगह यही तथ्य सामने आया है। प्रो. पी. एन. ओक को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था। 

निश्चित ही प्रो. ओक के दावों में कुछ दम है और यदि ये सही हैं, तो इस पर हर भारतीय को गौर करना चाहिए तथा उस छुपी हुई हकीकत और तथ्य को दुनिया के सामने लाना चाहिए। प्रो. ओक अपनी पुस्तक ‘ताजमहल- द ट्रू स्‍टोरी’ (TAJ MAHAL - THE TRUE STORY) में इस बात में विश्वास जताया है कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था। 
ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर, एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है, जिसे तब ‘तेजो महालय’ कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहां ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। 


ओक के अनुसार, शाहजहां के दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने ‘बादशाहनामा’ में मुग़ल बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है। जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी को मृत्यु के बाद मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में अस्थायी तौर पर दफना दिया गया था और उसके छह माह बाद तारीख 15 जमदी-उल-ओवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया। फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुन: दफनाया गया। 


लाहौरी के अनुसार, राजा जयसिंह अपने पुरखों के इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे। लेकिन, बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात कि पुष्टि के लिए यहां ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे। 


यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्राय: मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था। उदाहरनार्थ- हुमायूं, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये गए हैं। 


प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है। ‘महल’ शब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता। यहां यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है, वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है। पहला, शाहजहां की पत्नी का नाम ‘मुमताज महल’ कभी नही था, बल्कि उसका नाम ‘मुमताज-उल-ज़मानी’ था और दूसरा, किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज) का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्द्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है। 


प्रो. ओक दावा करते हैं कि ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। साथ ही साथ ओक कहते हैं कि मुमताज और शाहजहां की प्रेम कहानी चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहां के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है। इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षत: समर्थन कर रहे हैं। तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था। 
ओक के अनुसार, न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहां के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है। मुमताज की मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था। यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज की मृत्यु के सात साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया। परन्तु, उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नहीं प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों में यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर-शोर से चल रहा था। फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी., जो औरंगजेब के गद्दीनशीं होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहां रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था। 
प्रो. ओक बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं, जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि ताजमहल विशाल मकबरा न होकर, विशेषत: हिंदू शिव मन्दिर है। आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहां के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुंच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान शिव की मूर्ति, त्रिशूल, कलश आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताजमहल के संबंध में यह आम किंवदंति प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूंद-बूंद कर पानी टपकता रहता है। यदि यह सत्य है, तो पूरे विश्व मे किसी भी कब्र पर बूंद-बूंद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में शिवलिंग पर बूंद-बूंद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है। फिर ताजमहल (मकबरे) में बूंद-बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब?


प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे। 


जऱा सोचिये! यदि ओक का अनुसंधान सत्य है, तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, ‘तेजो महालय’ को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहां को क्यों? इससे जुड़ी तमाम यादों का संबंध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों? 



‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से...


रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से...


अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से...

फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’

Sunday, 5 February 2012

जो व्यक्ति गर्भ में................

जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : अगर बेटा वारस है,
तो बेटी पारस है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है

अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |

अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है

अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |

जीवन एक अजीव भूल भुलैया है.......

जीवन एक अजीव भूल भुलैया है !

कोई किसी को नहीं समझ पाया है इस कल्पनातीत संसार में ! हर व्यक्ति मौसम कि तरह रंग बदलने लगा है !

किसी कि फितरत पहचानना बहुत मुश्किल काम है !

किसी विचार व्यक्त किया था मुझे कि संवाद से सारी समस्याएँ हल हो जाती है, लेकिन संवाद तो उसी के साथ किया जा सकता है ना जो सवालों के जवाब देने को राजी हो !

जो व्यक्ति ख़ामोशी चादर ओढ़ ले उससे भला संवाद कैसे वाजिब है ? या जो कभी समझना ही न चाहे उसे केसे समझाया जा सकता है ?

पर .....

अपनी फितरत से जो अनजान हुआ करता है जिंदगी भर परेशांन हुआ करता है !

पल भर में जो छा जाए किसी तूफाँ सा चंद लम्हों का ही महमान हुआ करता है !

कहने को तो जान पहचान तो होती है दुश्मनों से भी और चलते राह गीरो से भी !

पर जिंदगीमें हम अजीम किसी को देते है प्यार वो सबसे बड़ा मान हुआ करता है !!

क्या है ब्रह्माण्ड....??

क्या है ब्रह्माण्ड....??
.(ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त विवेचन)
ब्राह्मण्ड यदि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश---इन पाँच महाभूतों के मिश्रण का परिणाम है, तो हमारा ये शरीर भी इन्ही के संघात से निर्मित है. ब्राह्मण्ड में सूर्य है तो इस शरीर में सूर्य का प्रतिनिधि आत्मतत्व विद्यमान है, ब्राह्मण्ड में चन्द्रमा है तो शरीर में उसका प्रतीक मन है, ब्राह्मण्ड में मंगल नामक लाल रंग का ग्रह विद्यमान है तो शरीर में विभिन्न रंगों के खाये हुए भोजन के रस से यकृत और पलीहा (जिगर और तिल्ली) द्वारा रंजित, पित्त के रूप में परिणित होने वाला रूधिर(खून)विद्यमान है. ब्राह्मण्ड में बुध,बृहस्पति,शुक्र और शनि नामक ग्रहों की सत्ता है तो हमारे इस शरीर में इन सबके प्रतिनिधि क्रमश:---वाणी, ज्ञान, वीर्य और दु:खानुभूति विद्यमान है. पर्वत, वृक्ष, लता, गुल्मादि के प्रतीक अस्थियाँ, केश रोम, नदी-नालों की भान्ती नसें, नाडियाँ और धमनियों का जाल बिछा हुआ है-----कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि की समस्त वस्तुएं हूबहू उसी रूप में हमारे इस शरीर में मौजूद हैं. आप इस शरीर को एक प्रकार से ब्राह्मण्ड का नक्शा कह सकते हैं.

अहं काको हतो राजन्! हंसाऽहंनिर्मला जल:.........

पुराने समय की बात है। एक राज्य में एक राजा था। किसी कारण से वह अन्य गाँव में जाना चाहता था। एक दिन वह धनुष-बाण सहित पैदल ही चल पड़ा। चलते-चलते राजा थक गया। अत: वह बीच रास्ते में ही एक विशाल पेड़ के नीचे बैठ गया। राजा अपने धनुष-बाण बगल में रखकर, चद्दर ओढ़कर सो गया। थोड़ी ही देर में उसे गहरी नींद लग गई। 

उसी पेड़ की खाली डाली पर एक कौआ बैठा था। उसने नीचे सोए हुए राजा पर बीट कर दी। बीट से राजा की चादर गंदी हो गई थी। राजा खर्राटे ले रहा था। उसे पता नहीं चला कि उसकी चादर खराब हो गई है।

कुछ समय के पश्चात कौआ वहाँ से उड़कर चला गया और थोड़ी ही देर में एक हंस उड़ता हुआ आया। हंस उसी डाली पर और उसी जगह पर बैठा, जहाँ पहले वह कौआ बैठा हुआ था अब अचानक राजा की नींद खुली। उठते ही जब उसने अपनी चादर देखी तो वह बीट से गंदी हो चुकी थी।

राजा स्वभाव से बड़ा क्रोधी था। उसकी नजर ऊपर वाली डाली पर गई, जहाँ हंस बैठा हुआ था। राजा ने समझा कि यह सब इसी हंस की ओछी हरकत है। इसी ने मेरी चादर गंदी की है।

क्रोधी राजा ने आव देखा न ताव, ऊपर बैठे हंस को अपना तीखा बाण चलाकर, उसे घायल कर दिया। हंस बेचारा घायल होकर नीचे गिर पड़ा और तड़पने लगा। वह तड़पते हुए राजा से कहने लगा-

'अहं काको हतो राजन्!
हंसाऽहंनिर्मला जल:।
दुष्ट स्थान प्रभावेन,
जातो जन्म निरर्थक।।'

अर्थात हे राजन्! मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया, तुमने मुझे अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया है? मैं तो निर्मल जल में रहने वाला प्राणी हूँ? ईश्वर की कैसी लीला है। सिर्फ एक बार कौए जैसे दुष्ट प्राणी की जगह पर बैठने मात्र से ही व्यर्थ में मेरे प्राण चले जा रहे हैं, फिर दुष्टों के साथ सदा रहने वालों का क्या हाल होता होगा?

हंस ने प्राण छोड़ने से पूर्व कहा - 'हे राजन्! दुष्टों की संगति नहीं करना। क्योंकि उनकी संगति का फल भी ऐसा ही होता है।' राजा को अपने किए अपराध का बोध हो गया। वह अब पश्चाताप करने लगा।

द्रोपदी यदि चुप रहती तो..........

!!...श्री राधे...!!
द्रोपदी यदि चुप रहती तो महाभारत नहीं होता !
सीता यदि बोलतीं तो रामायण की रचना नहीं होती !
इस प्रकार....
हमें क्या नहीं करना चाहिए ...ये महाभारत सिखाता है !
हमें क्या करना चाहिए ....ये रामायण सिखाती है !

जो भी हिन्दुओं से या हिन्दू धर्म से नफरत करते है उन............

जो भी हिन्दुओं से या हिन्दू धर्म से नफरत करते है उन सभी के लिए सिर्फ एक हिदायत है के हमारे उप्पर कीचड़ डालने से पहले अपने मजहब या धर्म के बारे में सही सही बताये ...अगर हिम्मत नहीं है अपनी पहचान बताने की तो अपनी तोती उर्फ़ बोलती बंद रखे ....क्यों की आप लोगो की बोलने की औकात नहीं वजह साफ़ है आप लोग हिंदुस्तान का कभी भला सोच ही नहीं सकते आप लोगो की नियत यहाँ हिन्दू आई डी बना कर हिन्दू लोगो में ही भेद भाव पैदा करना है ...और जो लोग सच्चे हिन्दू है वो इन लोगो की बात में ना आये !!!

हिन्दी साहित्य की रचना विदेशी आक्रमणोँ, युद्धों तथा गुलामी की परिस्थितियों मेँ हुई.............

हिन्दी साहित्य की रचना विदेशी आक्रमणोँ, युद्धों तथा गुलामी की परिस्थितियों मेँ हुई। मौखिक परम्परा मेँ जो कुछ सामग्री शेष रही, वह भी बहुत तथा भाषा की दृष्टि से इतनी बदल गयी कि उसका मूल रूप ही समाप्त हो गया। इस काल मेँ हिन्दी साहित्य मुख्यत: तीन क्षेत्रोँ से सम्बन्धित रहा है - राज्य, धर्म और लोक। राजदरबार में हिन्दी से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त तो होती है किन्तु रचनाओँ मेँ क्षेपकोँ के बाहुल्य के कारण वीरगाथात्मक रासो ग्रन्थों की प्रामाणिकता समाप्त हो गयी है। धर्म के क्षेत्र में अध्यात्म, भक्ति सम्बन्धी अनेक रचनाएँ प्राप्त होती हैँ, ये अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक हैँ। साहित्य प्रेमियोँ ने बहुत सी हस्तलिखित रचनाओँ को सुरक्षित रखा है तथा बहुत सा साहित्य मौखिक परम्परा में सुरक्षित रखा है।

हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित सामग्री का सँचयन सर्वप्रथम विलियम जोन्स [१७८४ ई.] द्वारा स्थापित बँगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने किया। इसके द्वारा लगभग ६०० संस्कृत तथा हिन्दी ग्रन्थोँ का पता लगाया गया। सोसाइटी की तरफ से डा० ए० टेसिटरी ने खोज कार्य किया, उन्होनेँ ’छन्द रावजयसती’ तथा ’कृष्ण-रुक्मिणी बेलि’ का संपादन भी किया। पश्चात वाराणसी मेँ १८९३ ई. मेँ नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था की सूचनाओँ से इतिहास-रचना के लिये अपरिमित सामग्री उपलब्ध हुई। इस सँस्था से जुड़कर डा० श्यामसुन्दरदास, श्याम बिहारी मिश्र, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, हीरालाल जैन, प० विश्वनाथप्रसाद मिश्र आदि विद्वानों ने खोज कार्य किया।

उन्नीसवीँ शती से पूर्व विभिन्न कवियोँ और लेखकोँ द्वारा अनेक ऎसे ग्रन्थोँ की रचना हो चुकी थी जिनमेँ हिन्दी के विभिन्न कवियोँ के जीवन-वृत्त एवँ कृतित्व का परिचय दिया गया है जैसे- कालिदास कृत "हजारा’[१७१८], बलदेवकृत ’सत्कविगिरा विलास"[१७४६], सुब्बासिँह कृत ’विद्वन्मोदतरँगिणी’[१८१७], कृष्णान्न्द व्यासदेव कृत "रागसागरोद्भव" और "रागकल्पद्रुम"[१८४३], सरदारकवि कृत "श्रंगार संग्रह"[१८४८], भारतेन्दु कृत "सुन्दरी तिलक"[१८६९] आदि -- किन्तु इनमेँ काल-क्रम, सन-सम्वत आदि का अभाव होने के कारण इन्हें इतिहास की सँज्ञा नहीँ दी जा सकती।

वस्तुत: हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का पहला प्रयास एक फ्रेँच विद्वान "गार्सां द तासी" ने किया। जिन्होँने फ्रेँच भाषा मेँ "हस्त्वार द ला लितरेत्युर ऎन्दुई ऎन्दुस्तानी" ग्रन्थ लिखा। इस ग्रन्थ में हिन्दी और उर्दू के ज्ञात कवियोँ का विवरण अकारादि क्रम से दिया गया है। इसका प्रथम भाग १८३९ ई. में तथा द्वितीय भाग १८४७ ई. में प्रकाशित हुआ, फिर १८७१ ई. में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। तासी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शिव सिंह सेँगर ने १८८३ ई. मेँ "शिव सिँह सरोज" की रचना की। इस ग्रन्थ में लगभग १००० कवियोँ कवियोँ का जीवन-चरित्र एवँ उनकी कृतियोँ के नमूने प्रस्तुत किये गये हैँ।

सन १८८८ में एशियाटिक सोसायटी आफ़ बँगाल की पत्रिका के विशेषाँक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित "द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर आफ़ हिन्दुस्तान" का प्रकाशन हुआ, जो नाम से इतिहास न होते हुए भी हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जा सकता है। इसमेँ लेखक ने कवियोँ और लेखकोँ का कालक्रमानुसार वर्गीकरण करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इतिहास मेँ कवियोँ को अँक देने वाली प्रणाली ग्रियर्सन की देन है। सोलहवीँ-सत्रहवीँ शताब्दी के काव्य को "स्वर्ण-युग" की संज्ञा देने वाले ग्रियर्सन ही हैँ। सामग्री को यथासम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना, प्रत्येक काल के शेष कवियोँ का अध्यायविशेष के अन्त में उल्लेख करना, सम्बन्धित साँस्कृतिक परिस्थितियों और प्रेरणा-स्रोतोँ का उदघाटन करना, हिन्दी साहित्य के विकास-क्रम का निर्धारण - चारण-काव्य, धार्मिक-काव्य, प्रेम-काव्य और दरबारी-काव्य के रूप में करना - आदि ग्रियर्सन की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैँ।

हिन्दी-साहित्येतिहास की परम्परा में मिश्रबन्धुओँ द्वारा रचित "मिश्रबन्धु विनोद" उल्लेख्नीय है। यह चार भागोँ मेँ विभक्त है। प्रथम तीन भाग १९१३ ई. मेँ प्रकाशित हुए तथा चतुर्थ भाग १९३४ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमेँ लगभग पांच हजार कवियों को स्थान दिया गया है और इसे आठ से भी अधिक कालखण्डों में विभाजित किया गया है। इतिहास के रूप मेँ इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमेँ कवियों के विवरणोँ के साथ-साथ साहित्य के विविध अँगोँ पर प्रकाश डाला गया है। कवियोँ की जीवनी तथा आलोचनाओँ के विवरण संग्रहीत किये गये हैँ। कवियोँ का सापेक्षिक महत्व निर्धारित करने के लिये उनकी श्रेणियाँ भी बनाई गयीँ हैँ। काव्य समीक्षा के क्षेत्र में परम्परागत पद्धति ही ग्रहीत हुई है। अधिकाँश परवर्ती इतिहासकारोँ ने इस इतिहास-ग्रन्थ का आश्रय ग्रहण किया है।

सन १९२९ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रन्थ "हिन्दी साहित्य का इतिहास" लिखा, जो मूलत: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित "हिन्दी- शब्द-सागर" की भूमिका में लिखा गया था, जिसे बाद मेँ पुस्तक का रूप दिया गया। इसके प्रारम्भ मेँ आचार्य शुक्ल ने लिखा -- " जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का सँचित प्रतिविम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीँ चित्तवृत्तियोँ की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामँजस्य दिखाना ही "साहित्य का इतिहास" कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत-कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"

आचार्य शुक्ल ने हिन्दी का आविर्भाव काल सातवीँ शताब्दी से मानते हुए भी हिन्दी साहित्य का आरम्भ विक्रमी सँ० १०५० से माना तथा सम्पूर्ण हिन्दी साहित्येतिहास को चार काल-खण्डोँ मेँ विभक्त किया। प्रत्येक काल का नामकरण उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर ही किया। आचार्य शुक्ल ने कवियोँ और साहित्यकारोँ के जीवन-चरित सम्बन्धी इतिवृत्त के स्थान पर उनकी रचनाओँ के साहित्यिक मूल्याँकन को प्रमुखता दी है। इस क्षेत्र मेँ उन्होँने चुने हुए कवियोँ को ही लिया है और उनके विवेचन मेँ उनकी साहित्यिक महत्ता व लघुता का ध्यान रखते हुए उन्हेँ तदनुसार ही स्थान दिया है। आचार्य द्वारा इतिहास की रचना उस समय हुई थी जबकि हिन्दी का अधिकाँश प्राचीन साहित्य अज्ञात, लुप्त एवँ अप्रकाशित अवस्था मेँ पड़ा हुआ था, उसका प्रामाणिक अध्यन-विश्लेषण नहीँ हो पाया था। उस युग की सीमित सामग्री को जो रूप उन्होँने विवेचनात्मक तौर पर दिया है, वह निश्चय ही उनकी स्वतँत्र चेतना एवँ विवेचना शक्ति का परिचायक है। उनका रसवादी सिद्धाँत लोकमँगल भावना की कसौटी, काव्य मेँ मानव-समाज का प्रतिविम्ब तथा साहित्यिक धारा को विकसित करने वाली शक्तियोँ का विश्लेषण आदि काव्य, कवि तथा युग के उत्कर्ष के निर्धारण के आधार रूप मेँ गृहीत हुए हैँ। विभिन्न काव्यधाराओँ और युगोँ की साहित्यिक प्रवृत्तियोँ के निर्धारण मेँ उन्हेँ सफलता प्राप्त हुई है। उन्होँने भक्ति काल को चार भागोँ मेँ बाँटा है - पहले निर्गुण-धारा और सगुण-धारा मेँ फिर प्रत्येक को दो-दो शाखाओँ - ज्ञानाश्रयी शाखा व प्रेमाश्रयी शाखा तथा रामभक्तिशाखा व कृष्णभक्तिशाखा मेँ। रीतिग्रन्थकारोँ के आचार्यत्व एवँ कवित्व का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उनकी उपलब्धियोँ तथा सीमाओँ के सम्बन्ध मेँ जो निर्णय आचार्य शुक्ल ने दिये, वे बहुत कुछ अँशोँ मेँ आज भी मान्य हैँ। भक्तिकाल की ही भाँति रीतिकाल मेँ भी नामकरण, सीमा-निर्धारण, परम्पराओँ व काव्यधाराओँ का वर्गीकरण वर्गविशेष के एकपक्षीय बोध का सूचक है जिससे इस काल के रीतिमुक्त प्रेममार्गी कवियोँ, वीररसात्मक काव्योँ के रचयिताओँ तथा राजनीति एवँ वैराग्य सम्बन्धी मुक्तकोँ के रचयिता कवियोँ के साथ न्याय नहीँ हो पाता। उन्होँने साहित्यिक परम्पराओँ और प्रवृत्तियोँ को युगविशेष की चित्तवृत्ति के प्रतिविम्ब के रूप में ही ग्रहण किया, उन तत्त्वोँ और स्रोतोँ की उपेक्षा की जिनका सम्बन्ध पूर्व प्रम्परा से है। परिणाम यह हुआ कि उन्होँने पूरे मध्यकाल की विभिन्न धाराओँ और प्रवृत्तियोँ को तदयुगीन मुस्लिम प्रभाव की देन के रूप मेँ स्वीकार कर लिया - जैसे भक्ति-आँदोलन तदयुगीन निराशा की देन है, सँत-मत इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव का सूचक है, प्रेमाख्यान-परम्परा सूफी मसनवियों से अनुकृत है, आदि। वस्तुत: सँस्कृत साहित्य की पौराणिक परम्पराओँ, प्राकृत-अपभ्रँश के प्रेमाख्यानोँ व मुक्तकोँ की धाराओँ, सिद्धोँ व नाथपँथियोँ की गुह्य वाणियोँ की उपेक्षा करके मध्यकालीन हिन्दी-काव्य की विभिन्न काव्यधाराओँ के वर्तमान स्वरूप की आलोचना भले की जा सके, किन्तु उसके आधार-स्रोतोँ का अनुसन्धान और उनके विकास-क्रम की ऎतिहासिक व्याख्या सम्भव नहीँ है।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने अपने ग्रन्थ "हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास" मेँ भाषा और साहित्य का आलोचनापरक विकास प्रदर्शित किया है। उन्होँने स्वदेशी साहित्य की महिमा का गुणगान किया है।

आचार्य शुक्ल के लगभग एक दशाब्दी बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "हिन्दी साहित्य की भूमिका" प्रस्तुत की। इसमेँ आचार्य द्विवेदी ने परम्परा का महत्व स्थापित करते हुए उन धारणाओँ का खण्डन किया, जो युगीन प्रभाव के एकाँगी दृष्टिकोण पर आधारित थीँ। "हिन्दी साहित्य की भूमिका" के अनन्तर आचार्य द्विवेदी की "हिन्दी साहित्य: उदभव और विकास", "हिन्दी साहित्य का आदिकाल" आदि इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ प्रकाशित हुईँ। हिन्दी साहित्य के इतिहास को विशेषत: मध्यकालीन काव्य के स्रोतोँ व पूर्व परम्पराओँ के अनुसँधान तथा उनकी अधिक सहानुभूतिपूर्ण व यथातथ्य व्याख्या करने की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी का योगदान अप्रतिम है। आचार्य शुक्ल की अनेक धारणाओँ और स्थापनाओँ को सबल प्रमाणोँ के आधार पर उन्होँने खण्डित किया है। निष्कर्ष रूप मेँ जहाँ द्विवेदीजी ने परम्परा पर बल दिया है, वहाँ आचार्य शुक्ल ने युग-स्थिति पर, अत: दोनोँ विद्वानोँ के मत परस्पर पूरक हैँ।

आचार्य द्विवेदी के साथ-साथ ही इस क्षेत्र मेँ डा० रामकुमार वर्मा अवतरित हुए। इनका "हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" सन १९३८ ई. मेँ प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ मेँ सँ० ७५० से १७५० विक्रमी तक की कालावधि को ही ग्रहण किया गया है। डा० वर्मा ने इतिहास को सात वर्गोँ मेँ विभक्त किया है। उन्होँने स्वयँभू को हिन्दी का पहला कवि मानते हुए हिन्दी साहित्य का आरम्भ सँ० ७५० विक्रमी से स्वीकार किया है। काल-विभाजन एवँ नामकरण करने मेँ आचार्य शुक्ल का अनुसरण किँचित परिवर्तन के साथ किया है। अनेक कवियोँ के काव्य-सौन्दर्य का आख्यान करते समय डा० वर्मा की लेखनी काव्यमय हो उठी है। शैली की सरसता एवँ प्रवाहात्मकता के कारण इनका इतिहास लोकप्रिय हुआ है।

सन १९३५ मेँ डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ने "हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" लिखा। डा० सुमनराजे इन्हेँ साहित्य मेँ वैज्ञानिक पद्धति का अनुसँधाता एवँ प्रयोक्ता मानती हैँ। डा० गुप्त ने हिन्दी के प्रथम कवि के रूप मेँ "भरतेश्वर बाहुबली" के रचयिता शालिभद्र सूरि को मान्यता दी है। वे बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो आदि को १३५० ई. के पूर्व की रचना मानते हुए भी विकास-क्रम मेँ मध्यकाल की निश्चित सीमा स्वीकार करते हैँ। जिससे इसमेँ चरितकाव्योँ का निर्णय, सूफी काव्य परम्परा और नाथपँथ का समुचित विवेचन नहीँ हुआ है। स्वातँत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य को सही पृष्ठभूमि नहीँ उपलब्ध हो पायी है।

डा० रामखेलावन पाण्डेय ने "हिन्दी साहित्य का नया इतिहास" नामक ग्रन्थ लिखा। इनका साहित्येतिहास सम्बन्धी विचार नवीन तथा कलात्मक है। इनका कहना है कि उन अंतरँग वृत्तियोँ और स्थितियोँ का अन्वेषण करना होगा, जिनके माध्यम से निर्दिष्टि अवधि की अँतरंग साँस्कृतिक चेतना और साहित्य-बोध की निर्दिष्टता की जा सके।

अन्य परवर्ती इतिहासकारोँ ने कुछ ऎसे शोध प्रबन्ध व समीक्षापरक ग्रन्थ लिखे जो हिन्दी साहित्य के इतिहास की आँशिक रूप मेँ नूतन व्याख्या प्रस्तुत करते हैँ। डा० मोतीलाल मेनारिया कृत "राजस्थानी भाषा और साहित्य", डा० वासुदेवसिँह कृत "हिन्दी साहित्य का उदभवकाल", परशुराम चतुर्वेदी कृत "उत्तरी भारत की सँत परम्परा", डा० विजयेन्द्र स्नातक का "राधावल्ल्भ सम्प्रदाय और उसका साहित्य", पँ० विश्वनाथप्रसाद मिश्र का "हिन्दी साहित्य का अतीत", श्री चन्द्रकाँत बाली का "पँजाब-प्रांतीय हिन्दी साहित्य का इतिहास", डा० टीकमसिँह तोमर का "हिन्दी वीरकाव्य", डा० केसरी नारायण शुक्ल, डा० श्री कृष्णलाल, डा० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय एवँ भोलानाथ तिवारी के आधुनिक काल सम्बन्धी विभिन्न शोध-प्रबन्ध, डा० सियाराम तिवारी का "मध्यकालीन खण्डकाव्य", डा० इन्द्रपालसिँह का "रीति कालीन प्रबन्ध काव्य", डा० सरला शुक्ल और डा० हरिकान्त श्रीवास्तव आदि के प्रेमाख्यान सम्बन्धी शोध प्रबन्ध आदि महत्वपूर्ण हैँ।

कालविशेष के इतिहास-लेखन की परम्परा मेँ डा० बच्चनसिँह ने "आधुनिक साहित्य का इतिहास" लिखा है। कुछ विद्वानोँ ने साहित्येतिहास के सैद्धान्तिक एवँ व्यवहारिक पक्षोँ तथा उसके विभिन्न काल-खण्डोँ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालने उद्देश्य से अनेक नूतन प्रयास किये हैँ, जिनमेँ डा० सुमनराजे की "साहित्येतिहास: सँरचना और स्वरूप", डा० राममूर्ति त्रिपाठी की "आदिकालीन हिन्दी साहित्य की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि", डा० शिव कुमार मिश्र की "हिन्दी साहित्येतिहास के सिद्धान्त", डाओ शम्भूनाथसिँह की "हिन्दी साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि" आदि कृतियाँ विशेषत: उल्लेखनीय हैँ।

इस प्रकार ज्योँ-ज्योँ साहित्य-लेखन की परम्परा आगे बढ़ती जाती है तथा साहित्यानुसँधान के क्षेत्र मेँ नये-नये तथ्योँ का उदघाटन होता जा रहा है, त्योँ-त्योँ साहित्येतिहासकार का कार्य भी गुरुतर होता जा रहा है। हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा सर्वथा नवीन ऎतिहासिक दृष्टि को खोजती और प्राप्त करती हुई नव-तत्व विवेचन की ओर अप्रतिहत रूप से अग्रसर है। नित्य नवीनता की उपलब्धि एवँ उसका वैज्ञानिक आकलन ही साहित्यकार का विशिष्ट दायित्व है।

वैभवं कामये न धनं कामये....................

वैभवं कामये न धनं कामये
केवलं कामिनी दर्शनं कामये
सृष्टि कार्येण तुष्टोस्म्यहं यद्यपि
चापि सौन्दर्य संवर्धनं कामये।
रेलयाने स्थिता उच्च शयनासने
मुक्त केशांगना अस्त व्यस्तासने
शोभिता तत्र सर्वांग आन्दोलिता
अनवरत यान परिचालनं कामये।
सैव मिलिता सड़क परिवहन वाहने
पंक्ति बद्धाः वयं यात्रि संमर्दने
मम समक्षे स्थिता श्रोणि वक्षोन्नता
अप्रयासांग स्पर्शनं कामये।
सैव दृष्टा मया अद्य नद्यास्तटे
सा जलान्निर्गता भाति क्लेदित पटे
दृशयते यादृशा शाटिकालिंगिता
तादृशम् एव आलिंगनं कामये।
एकदा मध्य नगरे स्थिते उपवने
अर्धकेशामपश्यम् लता मण्डपे
आंग्ल शवानेन सह खेलयन्ती तदा
अहमपि श्वानवत् क्रीडनं कामये।
नित्य पश्याम्यहं हाटके परिभ्रमन्
तां लिपिष्टकाधरोष्ठी कटाक्ष चालयन्
अतिमनोहारिणीं मारुति गामिनीम्
अंग प्रत्यंग आघातनं कामये।
स्कूटी यानेन गच्छति स्वकार्यालयं
अस्ति मार्गे वृहद् गत्यवरोधकम्
दृश्यते कूर्दयन् वक्ष पक्षी द्वयं
पथिषु सर्वत्र अवरोधकम् कामये।

हे सखि पतिगृहगमनं..............

हे सखि पतिगृहगमनं
प्रथमसुखदमपि किंत्वतिक्लिष्टं री।
परितो नूतन वातावरणे
वासम् कार्यविशिष्टं री।।
वदने सति अवरुद्धति कण्ठं
दिवसे अवगुण्ठनमाकण्ठं।
केवलमार्य त्यक्त्वा तत्र
किंञ्चिदपि मया न दृष्टं री।।
वंश पुरातन प्रथानुसरणं
नित्यं मर्यादितमाचरणं।
परिजन सकल भिन्न निर्देश पालने
प्रभवति कष्टं री।।
भर्तुर्पितरौ भगिनी भ्राता
खलु प्रत्येकः क्लेश विधाता।
सहसा प्रियतममुखं विलोक्य तु
सर्वं कष्ट विनिष्टं री।।
अभवत् कठिनं दिवावसानम्
बहु प्रतीक्षितं रजन्यागमनम्।
लज्जया किञ्च कथं कथयानि
विशिष्ट प्रणयपरिशिष्टं री।।

अवश्य जपें अजपा जप............

अवश्य जपें अजपा जप

ॐ श्री महागणेशाय नमः

मानव शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ है । यदि शास्त्र के अनुसार इसका उपयोग किया जाए तो मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है । इसके लिए शास्त्रो मे बहुत से साधन बतलाए गए हैं । उनमे सबसे सुगम साधन है- ' अजपाजप ' । इस साधन से पता चलता है कि जीव पर भगवान की कितनी असीम अनुकंपा है । ' अजपाजप ' का संकल्प कर लेने पर 24 घंटो मे एक क्षण भी व्यर्थ नही हो पाता - चाहे हम जागते हो , स्वप्न मे हों या सुषुप्ती मे , प्रत्येक दशा मे ' हंसः ' * का जप श्वाश क्रिया द्वारा अनायास होता ही रहता है । संकल्प कर देने भर से यह जप मनुष्य द्वारा किया हुआ माना जाता है ।

* हंसः - अग्नि पुराण मे बताया गया है कि श्वाश-प्रश्वाश द्वारा ' हंसः ' , ' सो$हं ' के रूप मे शरीर स्थित ब्रह्म का ही उच्चारण होता रहता है । अतः तत्व वेत्ता इसे ही ' अजपाजप ' कहते हैं ।

मेरे मित्र समूह के सभी सदस्यों से निवेदन है कि वे इस बिना श्रम के ' अजपाजप ' का संकल्प जरूर लें ।

Saturday, 4 February 2012

तुलसी’ जे कीरत चहहिं...............

स्नेही स्वजनों सादर मधुर शुभ प्रभात मंगलम !!


महाकवि संत गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है ,

तुलसी’ जे कीरत चहहिं पर की कीरत खोइ !
तिनके मुह मसि लागिहे मिटीह न मरिहे धोई !!

दूसरों की निंदा कर , प्रसंशा पाना या प्रतिष्ठा पाने का अनुभव करने का विचार ही कुत्सित है ! इस प्रकार की अवधारणा रखने वालो के मुख पर ऐसी कालिख लगती है ,जो मिटाए नहीं मिटती !!

साधारण प्राणी अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, वह अपनी सीमाओ को भलीभाँति जानता है ! जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है ! देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत दुर्लभ हैं , पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है ! उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है ! 

Wednesday, 1 February 2012

मनुष्य विचारों का पुंज है.............

मनुष्य विचारों का पुंज है। किसी भी व्यक्ति की पहचान किवह सज्जान-दुर्जन, शिष्ट-अशिष्ट, साधु-असाधु, संयमी-असंयमी है, विचारों से ही की जा सकती है। यजुर्वेद में कहा गया है-''आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिद्:।'' इस मंत्र का तात्पर्य यह है कि कल्याणकारी, विघ्नरहित, शुभफलप्रद विचार हमें सभी ओर से प्राप्त हों, जिससे आलस्य रहित और रक्षा करने वाले देवता प्रतिदिन सदा हमारी समृद्धि करे। सद्विचार हमें चारों ओर से प्राप्त हों। शास्त्रों में कहा गया है-'बालादापि शुभषितम्' -अर्थात बालक से भी अच्छी बात ग्रहण करनी चाहिए। मनुष्य जो कुछ मन में सोचता है वही वाणी से कहता है, वैसा ही कर्म करता है, उसी प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार बन जाता है। ऋग्वेद में कहा गया है-''समानो मंत्र: समिति: समानं मन: सह चित्तामेषाम्'' इस मंत्र का आशय यह है कि परमात्मा ने सभी को समान सुविधाएं दी है और समान उपकरण दिए है।

मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे दी गई सुविधाओं का समुचित प्रयोग करते हुए उन्नति करे। इसके लिए विचारों की एकता व भावनाओं का समन्वय आवश्यक है। अथर्ववेद के मंत्रों के माध्यम से कहा गया है कि लक्ष्य की पूर्ति के लिए हृदय की एकता अनिवार्य है तथा संकल्प, विचार और उद्देश्य भी समान होना आवश्यक है। समाज को सुसंगठित करने के लिए समान विचार, समान कर्म और समान लक्ष्य, इन तीन तत्वों की आवश्यकता होती है। यह भावना सद्विचारों से ही आ सकती है। शुभ विचारों से ही एक-दूसरे के हित-चिंतन की भावना उत्पन्न कर समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हुआ जा सकता है। मनुस्मृति के अनुसार जल से शरीर शुद्ध होता है। विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है। हम शरीर के साथ-साथ मन, आत्मा व बुद्धि को शुद्ध रखेंगे तो हमारे विचार स्वत: ही शुभ हो जाएंगे। मानव-जीवन अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए है। अभ्युदय का अभिप्राय है-सांसारिक उन्नति, सांसारिक सुख व वैभव। नि:श्रेयस का अर्थ मोक्ष के सुख से है। मनुष्य का मन शुभ विचारों से युक्त होने पर व्यक्ति आनंदित होता है। मनुष्य के उत्थान में विचारों का अत्यंत महत्व है। उत्ताम व शुभ विचार मनुष्य को निरंतर प्रगति के मार्ग पर ले जाते है।