Saturday, 16 November 2013

अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते...

-> अगर कोई इन्सान बहुत हंसता या हंसाता है ,
तो अंदर से वो बहुत अकेला है ..
-> अगर कोई इन्सान बहुत सोता है , तो अंदर से
वो बहुत उदास है ..
-> अगर कोई इन्सान खुद को बहुत मजबूत दिखाता है
और रोता नही , तो वो -अंदर से बहुत कमजोर है ..
-> अगर कोई जरा जरा सी बात पर रो देता है
तो वो बहुत मासूम और नाजुक दिल का है ..
-> अगर कोई हर बात पर नाराज़ हो जाता है
तो वो अंदर से बहुत अकेला और जिन्दगी में प्यार
की कमी महसूस करता है ..
लोगों को समझने की कोशिश
कीजिये ,जिन्दगी किसी का इंतज़ार नही करती ,
लोगों को एहसास कराइए की वो आप के लिए कितने
खास हैं.

 अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते....
ना मिलता ग़म तो बर्बादी के अफसाने कहाँ जाते.....

Saturday, 16 February 2013

ऊर्जा क्या है प्रेम प्रेम को अनुभव किया जा सकता है, इसे शब्दों से व्यक्त करना संभव नहींहै। प्रेम के बिना मानव जीवन का कोई अर्थ नहीं। एक दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है प्रेम। मानव हृदय में प्रेम का स्रोत है। संसार में आकर वह भौतिकता से जकड़ जाता है, जिससे तमाम विकृतियों और विकारों के साथ अनेक समस्याओं के जाल में फंस जाता है। तब एकमात्र उपाय प्रेम ही रह जाता है समस्याओं से निजात पाने का। प्रभु का स्वरूप है प्रेम, इसका संबंध हृदय से है। प्रेम और भक्ति में जब समर्पण की भावना जुड़ जाती है तब एक शक्ति बनती है। जीवन के लिए संजीवनी है प्रेम। भक्तों के जीवन का आधार है प्रेम। प्रेम की प्रकृति आत्मा को प्रभावित करती है। यह मानव प्रवृत्ति एवं मानवता की प्रथम आवश्यकता है। सच्चा प्रेम अंतस की वाणी समझने में समर्थ है। निराशा के क्षणों में आशा की किरण है प्रेम, यह हमारे विश्वास को बल प्रदान करता है। हमारे प्रियजन हमसे कितनी ही दूर क्यों न हों, प्रेम की अनुभूति हमें उनकी निकटता देती है। प्रत्येक प्राणी को प्रेम की भूख है, चाहे वह मनुष्य हो या अन्य जीवधारी, सभी में प्रेम का प्रभाव समान होता है। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां मनुष्य जीवन की सभी व्यावहारिक वस्तुओं से संपन्न है वहां प्रेम से विपन्न है। यह मानव समाज के लिए विचार का विषय है। इन सबसे दूर रहकर हमें प्रेम पथ का विस्तार करना होगा। प्रेम परम आनंदमयी है। प्रेमी सर्वत्र आनंद का अनुभव करता है। सारा संसार आनंदस्वरूप है, सर्वत्र सौंदर्य और माधुर्य भरा हुआ है। दृश्य और दृष्टा, दोनों प्रेममय हैं। जिस भक्त के हप

ऊर्जा क्या है प्रेम प्रेम को अनुभव किया जा सकता है, इसे शब्दों से व्यक्त करना संभव नहींहै। प्रेम के बिना मानव जीवन का कोई अर्थ नहीं। एक दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है प्रेम। मानव हृदय में प्रेम का स्रोत है। संसार में आकर वह भौतिकता से जकड़ जाता है, जिससे तमाम विकृतियों और विकारों के साथ अनेक समस्याओं के जाल में फंस जाता है। तब एकमात्र उपाय प्रेम ही रह जाता है समस्याओं से निजात पाने का। प्रभु का स्वरूप है प्रेम, इसका संबंध हृदय से है। प्रेम और भक्ति में जब समर्पण की भावना जुड़ जाती है तब एक शक्ति बनती है। जीवन के लिए संजीवनी है प्रेम। भक्तों के जीवन का आधार है प्रेम। प्रेम की प्रकृति आत्मा को प्रभावित करती है। यह मानव प्रवृत्ति एवं मानवता की प्रथम आवश्यकता है। सच्चा प्रेम अंतस की वाणी समझने में समर्थ है। निराशा के क्षणों में आशा की किरण है प्रेम, यह हमारे विश्वास को बल प्रदान करता है। हमारे प्रियजन हमसे कितनी ही दूर क्यों न हों, प्रेम की अनुभूति हमें उनकी निकटता देती है। प्रत्येक प्राणी को प्रेम की भूख है, चाहे वह मनुष्य हो या अन्य जीवधारी, सभी में प्रेम का प्रभाव समान होता है। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां मनुष्य जीवन की सभी व्यावहारिक वस्तुओं से संपन्न है वहां प्रेम से विपन्न है। यह मानव समाज के लिए विचार का विषय है। इन सबसे दूर रहकर हमें प्रेम पथ का विस्तार करना होगा। प्रेम परम आनंदमयी है। प्रेमी सर्वत्र आनंद का अनुभव करता है। सारा संसार आनंदस्वरूप है, सर्वत्र सौंदर्य और माधुर्य भरा हुआ है। दृश्य और दृष्टा, दोनों प्रेममय हैं। जिस भक्त के हृदय में परब्रंा परमात्मा पूर्णरूपेण विराजमान हों, वहां फिर राग-द्वेष का स्थान नहीं रह जाता। प्रेम के परम व दिव्य स्वरूप दर्शन के लिए मन को विषयों से दूर रखना अपरिहार्य है। इसके आगे समस्त सांसारिकता बौनी प्रतीत होती है। अनन्य भक्ति और परम प्रेम ही वास्तव में अमृत स्वरूप है। प्रेम का प्रभाव हृदय को प्रभावित करता है, यदि हमारा वास्तविक प्रेम परमात्मा के प्रति हो गया तो जीवन सफल है। सदाचार और सद्गुण प्रेम भाव के पोषक हैं।

Saturday, 3 March 2012

हमारे देश में सम्मोहन यानी हिप्नोटिज्म को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है..........

हमारे देश में सम्मोहन यानी हिप्नोटिज्म को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है। प्राचीन ग्रंथों में सम्मोहन का जिक्र कठिन सिद्धि के रूप में किया गया है। सम्मोहन सदैव ही जिज्ञासा एवं आश्चर्य का विषय रहा है। इसे विज्ञान और किंवदंतियों की सीमा रेखा भी कह सकते हैं। आजकल कई टीवी धारावाहिकों में सम्मोहन का इस्तेमाल रहस्य उत्पन्न करने के लिए भी किया जाता है जबकि विदेशों में इसे गंभीर विषय मानते हुए शोध हो रहे हैं। आधुनिक रूप से सम्मोहन 18वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ था। इसे अर्ध-विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय ऑस्ट्रियावासी फ्रांस मेस्मर को है। हिप्नोटिज्म शब्द का आविष्कार 19वीं शताब्दी के डॉ. जेम्स ब्रेड ने किया।

सम्मोहन व्यक्ति के मन की वह अवस्था है जिसमें उसका चेतन मन धीरे-धीरे तन्द्रा की अवस्था में चला जाता है और अर्धचेतन मन सम्मोहन की प्रक्रिया द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है। साधारण नींद और सम्मोहन की नींद में अंतर होता है। साधारण नींद में हमारा चेतन मन अपने आप सो जाता है तथा अर्धचेतन मन जागृत हो जाता है।

ND
इस परिवर्तन के लिए किसी बाहरी शक्ति का उपयोग नहीं होता, जबकि सम्मोहन तन्द्रा में सम्मोहनकर्ता चेतन मन को सुलाकर अचेतन को आगे लाता है और उसे सुझाव के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार करता है। हर व्यक्ति का जीवन उसके या किसी और व्यक्ति के सुझावों पर चलता है। व्यक्ति को सम्मोहन करने के लिए उसकी पाँचों इंद्रियों के माध्यम से जो प्रभाव उसके मन पर डाला जाता है उसे ही यहाँ सुझाव कहते हैं।

हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएँ होती हैं : चेतन मन और अचेतन मन। हमारा अचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। बहुत से लोगों की धारणा है कि केवल कमजोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को ही सम्मोहित किया जा सकता है। इसके विपरीत दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को भी आसानी से सम्मोहित किया जा सकता है। हर व्यक्ति को सम्मोहित करने का तरीका समान नहीं होता। हर व्यक्ति के अनुसार सुझाव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। हम अपने आप को भी विभिन्न प्रकार के सुझाव दे सकते हैं। रात्रि में अर्धजागृत अवस्था के दौरान वे सुझाव हम अपने आपको देकर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

ND
मैं सब बातों में बेहतर होता जा रहा हूँ/रही हूँ।

मैं दिन-प्रतिदिन अपने कार्यों में कुशल होता जा रहा हूँ/रही हूँ।

मैं सदा स्वस्थ, प्रसन्नाचित, उत्साहित रहता हूँ/रहती हूँ।

मैं अपनी सभी शुभ इच्छाएँ पूर्ण करने में समर्थ हूँ।

मेरा अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण है, मैं चर्चा के समय उत्तेजित नहीं होता हूँ/होती हूँ।

मेरी स्मरण शक्ति अच्छी होती जा रही है, मुझे नई बातें सीखने में आसानी होती है।

मेरी भाषण देने की योग्यता बढ़ती जा रही है।

मेरा व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है।

ऐसे विभिन्न प्रकार के सुझाव हम रात को सोने के पूर्व अपने आपको अनेक बार देकर कुछ ही दिनों में चमत्कारिक परिणाम पा सकते हैं। बीमारियों के इलाज में भी हिप्नोथैरेपी कारगर सिद्ध हो सकती है। इसके जरिए असामान्य रोगों का भी उपचार संभव है। पिछले कुछ वर्षों से हुए शोध से हिप्नोथैरेपी मानसिक विकारों को दूर करने सहित पारिवारिक विवादों के हल में भी कारगर सिद्ध हुई है। इसके माध्यम से हम न केवल गुर्दा प्रत्यारोपण के समय की जाने वाली सर्जरी का तनाव कम कर सकते हैं, अपितु इसके माध्यम से हम प्रसव के समय होने वाली पीड़ा को भी कम कर सकते हैं

Monday, 6 February 2012

सब की जुबा पर एक ही राग है...........

सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है ?
कोई गरीबी को रोता है
तो किसी ने नेता को कोसा है
कोई चीखता कानून पे
तो कोई गुंडागर्दी पे भड़कता है .

कोई मुझे एक बात बताये ...
अपने गिरेबान में झाँक के आये ...

कितनों ने अँधेरे झोपड़ों में
दीपक जलाए ?
कितनों ने सड़क पे घूमते
फटेहाल बच्चों को
पाठशाला के रस्ते बताये ?
कितनों ने एक वक्त की
थाली किसी भूखे को खिलाई ?

ऊँगली उठाते हैं देश के विकास पर ?
बराबरी करते हैं अमरीका से ?
बात करते हैं बच्चों के संस्कारों की ?

उँगलियों पे जरा वो गिन के बता दें
देश के विकास में कितने काम कर दिखाए ?
अमेरिकन जैसा ईमानदारी से
कितने टैक्स भर पाए ?
अपने बच्चों को कितना
देशभक्ति का पाठ पढा पाए ?

विकास की बात आती है
जब अपने देश की तो
लायक होते ही अपने बच्चों को
कमाने के लिए
विदेशों की तरक्की का
पहिया बना देते हैं .
खुद का बुढापा चाहे दुख में बीते
हरे नोटों की चमक में
मगर जी ललचाता है .
और बड़े गर्व से कहते हैं
हमारे बच्चे विदेश में रहते हैं.

आज के बच्चों को पता नहीं
राम -सीता कौन थे ?
और महाभारत में पांडव कौन थे..?

उन्हें पता नहीं राष्ट्र पिता कौन हैं ?
आजादी किसको कहते हैं
और आजादी के दीवाने कौन हैं ?

हमारा राष्ट्रीय गान क्या है ?
कितनी बार जय हो जय हो
का घोष होता है
और कितनी नदियों के
नाम आते हैं ?

हर माता पिता फौज में
भेजने की बजाये
विदेश भेजना पसंद करते हैं ...
तो कैसे बात करते हैं
देश में कानून की ?
किसको फ़िक्र है
देश की सुरक्षा की ?
किसे चिंता है
भ्रष्ट नेता को
पर्दाफ़ाश करने की ?

बस रोना सभी रोते हैं
फिर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
और चैन की नींद सोते हैं.
सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है .

‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से... रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से... अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से... फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’


 बचपन से ही सुनते आए हैं कि देश की सबसे खूबसूरत इमारत ‘ताजमहल’ को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया है। स्कूल किताबें हों या समाचार-पत्रों के पन्ने, हर जगह यही तथ्य सामने आया है। प्रो. पी. एन. ओक को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था। 

निश्चित ही प्रो. ओक के दावों में कुछ दम है और यदि ये सही हैं, तो इस पर हर भारतीय को गौर करना चाहिए तथा उस छुपी हुई हकीकत और तथ्य को दुनिया के सामने लाना चाहिए। प्रो. ओक अपनी पुस्तक ‘ताजमहल- द ट्रू स्‍टोरी’ (TAJ MAHAL - THE TRUE STORY) में इस बात में विश्वास जताया है कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था। 
ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर, एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है, जिसे तब ‘तेजो महालय’ कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहां ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। 


ओक के अनुसार, शाहजहां के दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने ‘बादशाहनामा’ में मुग़ल बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है। जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी को मृत्यु के बाद मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में अस्थायी तौर पर दफना दिया गया था और उसके छह माह बाद तारीख 15 जमदी-उल-ओवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया। फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुन: दफनाया गया। 


लाहौरी के अनुसार, राजा जयसिंह अपने पुरखों के इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे। लेकिन, बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात कि पुष्टि के लिए यहां ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे। 


यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्राय: मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था। उदाहरनार्थ- हुमायूं, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये गए हैं। 


प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है। ‘महल’ शब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता। यहां यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है, वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है। पहला, शाहजहां की पत्नी का नाम ‘मुमताज महल’ कभी नही था, बल्कि उसका नाम ‘मुमताज-उल-ज़मानी’ था और दूसरा, किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज) का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्द्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है। 


प्रो. ओक दावा करते हैं कि ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। साथ ही साथ ओक कहते हैं कि मुमताज और शाहजहां की प्रेम कहानी चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहां के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है। इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षत: समर्थन कर रहे हैं। तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था। 
ओक के अनुसार, न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहां के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है। मुमताज की मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था। यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज की मृत्यु के सात साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया। परन्तु, उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नहीं प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों में यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर-शोर से चल रहा था। फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी., जो औरंगजेब के गद्दीनशीं होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहां रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था। 
प्रो. ओक बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं, जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि ताजमहल विशाल मकबरा न होकर, विशेषत: हिंदू शिव मन्दिर है। आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहां के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुंच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान शिव की मूर्ति, त्रिशूल, कलश आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताजमहल के संबंध में यह आम किंवदंति प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूंद-बूंद कर पानी टपकता रहता है। यदि यह सत्य है, तो पूरे विश्व मे किसी भी कब्र पर बूंद-बूंद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में शिवलिंग पर बूंद-बूंद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है। फिर ताजमहल (मकबरे) में बूंद-बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब?


प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे। 


जऱा सोचिये! यदि ओक का अनुसंधान सत्य है, तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, ‘तेजो महालय’ को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहां को क्यों? इससे जुड़ी तमाम यादों का संबंध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों? 



‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से...


रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से...


अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से...

फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’

Sunday, 5 February 2012

जो व्यक्ति गर्भ में................

जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : अगर बेटा वारस है,
तो बेटी पारस है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है

अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |

अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है

अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |