Sunday, 18 March 2012
Saturday, 3 March 2012
हमारे देश में सम्मोहन यानी हिप्नोटिज्म को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है..........
हमारे देश में सम्मोहन यानी हिप्नोटिज्म को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है। प्राचीन ग्रंथों में सम्मोहन का जिक्र कठिन सिद्धि के रूप में किया गया है। सम्मोहन सदैव ही जिज्ञासा एवं आश्चर्य का विषय रहा है। इसे विज्ञान और किंवदंतियों की सीमा रेखा भी कह सकते हैं। आजकल कई टीवी धारावाहिकों में सम्मोहन का इस्तेमाल रहस्य उत्पन्न करने के लिए भी किया जाता है जबकि विदेशों में इसे गंभीर विषय मानते हुए शोध हो रहे हैं। आधुनिक रूप से सम्मोहन 18वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ था। इसे अर्ध-विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय ऑस्ट्रियावासी फ्रांस मेस्मर को है। हिप्नोटिज्म शब्द का आविष्कार 19वीं शताब्दी के डॉ. जेम्स ब्रेड ने किया।
सम्मोहन व्यक्ति के मन की वह अवस्था है जिसमें उसका चेतन मन धीरे-धीरे तन्द्रा की अवस्था में चला जाता है और अर्धचेतन मन सम्मोहन की प्रक्रिया द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है। साधारण नींद और सम्मोहन की नींद में अंतर होता है। साधारण नींद में हमारा चेतन मन अपने आप सो जाता है तथा अर्धचेतन मन जागृत हो जाता है।
ND
इस परिवर्तन के लिए किसी बाहरी शक्ति का उपयोग नहीं होता, जबकि सम्मोहन तन्द्रा में सम्मोहनकर्ता चेतन मन को सुलाकर अचेतन को आगे लाता है और उसे सुझाव के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार करता है। हर व्यक्ति का जीवन उसके या किसी और व्यक्ति के सुझावों पर चलता है। व्यक्ति को सम्मोहन करने के लिए उसकी पाँचों इंद्रियों के माध्यम से जो प्रभाव उसके मन पर डाला जाता है उसे ही यहाँ सुझाव कहते हैं।
हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएँ होती हैं : चेतन मन और अचेतन मन। हमारा अचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। बहुत से लोगों की धारणा है कि केवल कमजोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को ही सम्मोहित किया जा सकता है। इसके विपरीत दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को भी आसानी से सम्मोहित किया जा सकता है। हर व्यक्ति को सम्मोहित करने का तरीका समान नहीं होता। हर व्यक्ति के अनुसार सुझाव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। हम अपने आप को भी विभिन्न प्रकार के सुझाव दे सकते हैं। रात्रि में अर्धजागृत अवस्था के दौरान वे सुझाव हम अपने आपको देकर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
ND
मैं सब बातों में बेहतर होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं दिन-प्रतिदिन अपने कार्यों में कुशल होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं सदा स्वस्थ, प्रसन्नाचित, उत्साहित रहता हूँ/रहती हूँ।
मैं अपनी सभी शुभ इच्छाएँ पूर्ण करने में समर्थ हूँ।
मेरा अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण है, मैं चर्चा के समय उत्तेजित नहीं होता हूँ/होती हूँ।
मेरी स्मरण शक्ति अच्छी होती जा रही है, मुझे नई बातें सीखने में आसानी होती है।
मेरी भाषण देने की योग्यता बढ़ती जा रही है।
मेरा व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है।
ऐसे विभिन्न प्रकार के सुझाव हम रात को सोने के पूर्व अपने आपको अनेक बार देकर कुछ ही दिनों में चमत्कारिक परिणाम पा सकते हैं। बीमारियों के इलाज में भी हिप्नोथैरेपी कारगर सिद्ध हो सकती है। इसके जरिए असामान्य रोगों का भी उपचार संभव है। पिछले कुछ वर्षों से हुए शोध से हिप्नोथैरेपी मानसिक विकारों को दूर करने सहित पारिवारिक विवादों के हल में भी कारगर सिद्ध हुई है। इसके माध्यम से हम न केवल गुर्दा प्रत्यारोपण के समय की जाने वाली सर्जरी का तनाव कम कर सकते हैं, अपितु इसके माध्यम से हम प्रसव के समय होने वाली पीड़ा को भी कम कर सकते हैं
सम्मोहन व्यक्ति के मन की वह अवस्था है जिसमें उसका चेतन मन धीरे-धीरे तन्द्रा की अवस्था में चला जाता है और अर्धचेतन मन सम्मोहन की प्रक्रिया द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है। साधारण नींद और सम्मोहन की नींद में अंतर होता है। साधारण नींद में हमारा चेतन मन अपने आप सो जाता है तथा अर्धचेतन मन जागृत हो जाता है।
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इस परिवर्तन के लिए किसी बाहरी शक्ति का उपयोग नहीं होता, जबकि सम्मोहन तन्द्रा में सम्मोहनकर्ता चेतन मन को सुलाकर अचेतन को आगे लाता है और उसे सुझाव के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार करता है। हर व्यक्ति का जीवन उसके या किसी और व्यक्ति के सुझावों पर चलता है। व्यक्ति को सम्मोहन करने के लिए उसकी पाँचों इंद्रियों के माध्यम से जो प्रभाव उसके मन पर डाला जाता है उसे ही यहाँ सुझाव कहते हैं।
हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएँ होती हैं : चेतन मन और अचेतन मन। हमारा अचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। बहुत से लोगों की धारणा है कि केवल कमजोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को ही सम्मोहित किया जा सकता है। इसके विपरीत दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को भी आसानी से सम्मोहित किया जा सकता है। हर व्यक्ति को सम्मोहित करने का तरीका समान नहीं होता। हर व्यक्ति के अनुसार सुझाव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। हम अपने आप को भी विभिन्न प्रकार के सुझाव दे सकते हैं। रात्रि में अर्धजागृत अवस्था के दौरान वे सुझाव हम अपने आपको देकर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
ND
मैं सब बातों में बेहतर होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं दिन-प्रतिदिन अपने कार्यों में कुशल होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं सदा स्वस्थ, प्रसन्नाचित, उत्साहित रहता हूँ/रहती हूँ।
मैं अपनी सभी शुभ इच्छाएँ पूर्ण करने में समर्थ हूँ।
मेरा अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण है, मैं चर्चा के समय उत्तेजित नहीं होता हूँ/होती हूँ।
मेरी स्मरण शक्ति अच्छी होती जा रही है, मुझे नई बातें सीखने में आसानी होती है।
मेरी भाषण देने की योग्यता बढ़ती जा रही है।
मेरा व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है।
ऐसे विभिन्न प्रकार के सुझाव हम रात को सोने के पूर्व अपने आपको अनेक बार देकर कुछ ही दिनों में चमत्कारिक परिणाम पा सकते हैं। बीमारियों के इलाज में भी हिप्नोथैरेपी कारगर सिद्ध हो सकती है। इसके जरिए असामान्य रोगों का भी उपचार संभव है। पिछले कुछ वर्षों से हुए शोध से हिप्नोथैरेपी मानसिक विकारों को दूर करने सहित पारिवारिक विवादों के हल में भी कारगर सिद्ध हुई है। इसके माध्यम से हम न केवल गुर्दा प्रत्यारोपण के समय की जाने वाली सर्जरी का तनाव कम कर सकते हैं, अपितु इसके माध्यम से हम प्रसव के समय होने वाली पीड़ा को भी कम कर सकते हैं
Monday, 6 February 2012
सब की जुबा पर एक ही राग है...........
सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है ?
कोई गरीबी को रोता है
तो किसी ने नेता को कोसा है
कोई चीखता कानून पे
तो कोई गुंडागर्दी पे भड़कता है .
कोई मुझे एक बात बताये ...
अपने गिरेबान में झाँक के आये ...
कितनों ने अँधेरे झोपड़ों में
दीपक जलाए ?
कितनों ने सड़क पे घूमते
फटेहाल बच्चों को
पाठशाला के रस्ते बताये ?
कितनों ने एक वक्त की
थाली किसी भूखे को खिलाई ?
ऊँगली उठाते हैं देश के विकास पर ?
बराबरी करते हैं अमरीका से ?
बात करते हैं बच्चों के संस्कारों की ?
उँगलियों पे जरा वो गिन के बता दें
देश के विकास में कितने काम कर दिखाए ?
अमेरिकन जैसा ईमानदारी से
कितने टैक्स भर पाए ?
अपने बच्चों को कितना
देशभक्ति का पाठ पढा पाए ?
विकास की बात आती है
जब अपने देश की तो
लायक होते ही अपने बच्चों को
कमाने के लिए
विदेशों की तरक्की का
पहिया बना देते हैं .
खुद का बुढापा चाहे दुख में बीते
हरे नोटों की चमक में
मगर जी ललचाता है .
और बड़े गर्व से कहते हैं
हमारे बच्चे विदेश में रहते हैं.
आज के बच्चों को पता नहीं
राम -सीता कौन थे ?
और महाभारत में पांडव कौन थे..?
उन्हें पता नहीं राष्ट्र पिता कौन हैं ?
आजादी किसको कहते हैं
और आजादी के दीवाने कौन हैं ?
हमारा राष्ट्रीय गान क्या है ?
कितनी बार जय हो जय हो
का घोष होता है
और कितनी नदियों के
नाम आते हैं ?
हर माता पिता फौज में
भेजने की बजाये
विदेश भेजना पसंद करते हैं ...
तो कैसे बात करते हैं
देश में कानून की ?
किसको फ़िक्र है
देश की सुरक्षा की ?
किसे चिंता है
भ्रष्ट नेता को
पर्दाफ़ाश करने की ?
बस रोना सभी रोते हैं
फिर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
और चैन की नींद सोते हैं.
सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है .
देश का कैसा बिगड़ा हाल है ?
कोई गरीबी को रोता है
तो किसी ने नेता को कोसा है
कोई चीखता कानून पे
तो कोई गुंडागर्दी पे भड़कता है .
कोई मुझे एक बात बताये ...
अपने गिरेबान में झाँक के आये ...
कितनों ने अँधेरे झोपड़ों में
दीपक जलाए ?
कितनों ने सड़क पे घूमते
फटेहाल बच्चों को
पाठशाला के रस्ते बताये ?
कितनों ने एक वक्त की
थाली किसी भूखे को खिलाई ?
ऊँगली उठाते हैं देश के विकास पर ?
बराबरी करते हैं अमरीका से ?
बात करते हैं बच्चों के संस्कारों की ?
उँगलियों पे जरा वो गिन के बता दें
देश के विकास में कितने काम कर दिखाए ?
अमेरिकन जैसा ईमानदारी से
कितने टैक्स भर पाए ?
अपने बच्चों को कितना
देशभक्ति का पाठ पढा पाए ?
विकास की बात आती है
जब अपने देश की तो
लायक होते ही अपने बच्चों को
कमाने के लिए
विदेशों की तरक्की का
पहिया बना देते हैं .
खुद का बुढापा चाहे दुख में बीते
हरे नोटों की चमक में
मगर जी ललचाता है .
और बड़े गर्व से कहते हैं
हमारे बच्चे विदेश में रहते हैं.
आज के बच्चों को पता नहीं
राम -सीता कौन थे ?
और महाभारत में पांडव कौन थे..?
उन्हें पता नहीं राष्ट्र पिता कौन हैं ?
आजादी किसको कहते हैं
और आजादी के दीवाने कौन हैं ?
हमारा राष्ट्रीय गान क्या है ?
कितनी बार जय हो जय हो
का घोष होता है
और कितनी नदियों के
नाम आते हैं ?
हर माता पिता फौज में
भेजने की बजाये
विदेश भेजना पसंद करते हैं ...
तो कैसे बात करते हैं
देश में कानून की ?
किसको फ़िक्र है
देश की सुरक्षा की ?
किसे चिंता है
भ्रष्ट नेता को
पर्दाफ़ाश करने की ?
बस रोना सभी रोते हैं
फिर भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
और चैन की नींद सोते हैं.
सब की जुबा पर एक ही राग है
देश का कैसा बिगड़ा हाल है .
‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से... रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से... अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से... फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’
बचपन से ही सुनते आए हैं कि देश की सबसे खूबसूरत इमारत ‘ताजमहल’ को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया है। स्कूल किताबें हों या समाचार-पत्रों के पन्ने, हर जगह यही तथ्य सामने आया है। प्रो. पी. एन. ओक को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था।
निश्चित ही प्रो. ओक के दावों में कुछ दम है और यदि ये सही हैं, तो इस पर हर भारतीय को गौर करना चाहिए तथा उस छुपी हुई हकीकत और तथ्य को दुनिया के सामने लाना चाहिए। प्रो. ओक अपनी पुस्तक ‘ताजमहल- द ट्रू स्टोरी’ (TAJ MAHAL - THE TRUE STORY) में इस बात में विश्वास जताया है कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था।
ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर, एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है, जिसे तब ‘तेजो महालय’ कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहां ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।
ओक के अनुसार, शाहजहां के दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने ‘बादशाहनामा’ में मुग़ल बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है। जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी को मृत्यु के बाद मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में अस्थायी तौर पर दफना दिया गया था और उसके छह माह बाद तारीख 15 जमदी-उल-ओवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया। फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुन: दफनाया गया।
लाहौरी के अनुसार, राजा जयसिंह अपने पुरखों के इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे। लेकिन, बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात कि पुष्टि के लिए यहां ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।
यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्राय: मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था। उदाहरनार्थ- हुमायूं, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये गए हैं।
प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है। ‘महल’ शब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता। यहां यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है, वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है। पहला, शाहजहां की पत्नी का नाम ‘मुमताज महल’ कभी नही था, बल्कि उसका नाम ‘मुमताज-उल-ज़मानी’ था और दूसरा, किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज) का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्द्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है।
प्रो. ओक दावा करते हैं कि ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। साथ ही साथ ओक कहते हैं कि मुमताज और शाहजहां की प्रेम कहानी चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहां के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है। इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षत: समर्थन कर रहे हैं। तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
ओक के अनुसार, न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहां के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है। मुमताज की मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था। यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज की मृत्यु के सात साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया। परन्तु, उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नहीं प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों में यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर-शोर से चल रहा था। फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी., जो औरंगजेब के गद्दीनशीं होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहां रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था।
प्रो. ओक बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं, जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि ताजमहल विशाल मकबरा न होकर, विशेषत: हिंदू शिव मन्दिर है। आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहां के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुंच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान शिव की मूर्ति, त्रिशूल, कलश आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताजमहल के संबंध में यह आम किंवदंति प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूंद-बूंद कर पानी टपकता रहता है। यदि यह सत्य है, तो पूरे विश्व मे किसी भी कब्र पर बूंद-बूंद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में शिवलिंग पर बूंद-बूंद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है। फिर ताजमहल (मकबरे) में बूंद-बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब?
प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे।
जऱा सोचिये! यदि ओक का अनुसंधान सत्य है, तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, ‘तेजो महालय’ को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहां को क्यों? इससे जुड़ी तमाम यादों का संबंध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों?
‘आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से...
रूहें लिपट के रोती हैं हर खासो-आम से...
अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से...
फिऱ भी यहां जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...’
Sunday, 5 February 2012
जो व्यक्ति गर्भ में................
जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : अगर बेटा वारस है,
तो बेटी पारस है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है
अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है
अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : जो व्यक्ति गर्भ में
बेटियों की हत्या करते हैं उनके
लिए यह बात है. हमेशा याद
रखना : अगर बेटा वारस है,
तो बेटी पारस है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है
अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |
अगर बेटा वंश है, तो बेटी अंश है |
अगर बेटा आन है, तो बेटी शान
है |
अगर बेटा तन है, तो बेटी मन है | अगर बेटा मान है,
तो बेटी गुमान है |
अगर बेटा संस्कार,
तो बेटी संस्कृति है |
अगर बेटा आग है, तो बेटी बाग़
है | अगर बेटा दवा है, तो बेटी दुआ है
अगर बेटा भाग्य है,
तो बेटी विधाता है |
अगर बेटा शब्द है, तो बेटी अर्थ
है l अगर बेटा गीत है,
तो बेटी संगीत है |
जीवन एक अजीव भूल भुलैया है.......
जीवन एक अजीव भूल भुलैया है !
कोई किसी को नहीं समझ पाया है इस कल्पनातीत संसार में ! हर व्यक्ति मौसम कि तरह रंग बदलने लगा है !
किसी कि फितरत पहचानना बहुत मुश्किल काम है !
किसी विचार व्यक्त किया था मुझे कि संवाद से सारी समस्याएँ हल हो जाती है, लेकिन संवाद तो उसी के साथ किया जा सकता है ना जो सवालों के जवाब देने को राजी हो !
जो व्यक्ति ख़ामोशी चादर ओढ़ ले उससे भला संवाद कैसे वाजिब है ? या जो कभी समझना ही न चाहे उसे केसे समझाया जा सकता है ?
पर .....
अपनी फितरत से जो अनजान हुआ करता है जिंदगी भर परेशांन हुआ करता है !
पल भर में जो छा जाए किसी तूफाँ सा चंद लम्हों का ही महमान हुआ करता है !
कहने को तो जान पहचान तो होती है दुश्मनों से भी और चलते राह गीरो से भी !
पर जिंदगीमें हम अजीम किसी को देते है प्यार वो सबसे बड़ा मान हुआ करता है !!
कोई किसी को नहीं समझ पाया है इस कल्पनातीत संसार में ! हर व्यक्ति मौसम कि तरह रंग बदलने लगा है !
किसी कि फितरत पहचानना बहुत मुश्किल काम है !
किसी विचार व्यक्त किया था मुझे कि संवाद से सारी समस्याएँ हल हो जाती है, लेकिन संवाद तो उसी के साथ किया जा सकता है ना जो सवालों के जवाब देने को राजी हो !
जो व्यक्ति ख़ामोशी चादर ओढ़ ले उससे भला संवाद कैसे वाजिब है ? या जो कभी समझना ही न चाहे उसे केसे समझाया जा सकता है ?
पर .....
अपनी फितरत से जो अनजान हुआ करता है जिंदगी भर परेशांन हुआ करता है !
पल भर में जो छा जाए किसी तूफाँ सा चंद लम्हों का ही महमान हुआ करता है !
कहने को तो जान पहचान तो होती है दुश्मनों से भी और चलते राह गीरो से भी !
पर जिंदगीमें हम अजीम किसी को देते है प्यार वो सबसे बड़ा मान हुआ करता है !!
क्या है ब्रह्माण्ड....??
क्या है ब्रह्माण्ड....??
.(ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त विवेचन)
ब्राह्मण्ड यदि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश---इन पाँच महाभूतों के मिश्रण का परिणाम है, तो हमारा ये शरीर भी इन्ही के संघात से निर्मित है. ब्राह्मण्ड में सूर्य है तो इस शरीर में सूर्य का प्रतिनिधि आत्मतत्व विद्यमान है, ब्राह्मण्ड में चन्द्रमा है तो शरीर में उसका प्रतीक मन है, ब्राह्मण्ड में मंगल नामक लाल रंग का ग्रह विद्यमान है तो शरीर में विभिन्न रंगों के खाये हुए भोजन के रस से यकृत और पलीहा (जिगर और तिल्ली) द्वारा रंजित, पित्त के रूप में परिणित होने वाला रूधिर(खून)विद्यमान है. ब्राह्मण्ड में बुध,बृहस्पति,शुक्र और शनि नामक ग्रहों की सत्ता है तो हमारे इस शरीर में इन सबके प्रतिनिधि क्रमश:---वाणी, ज्ञान, वीर्य और दु:खानुभूति विद्यमान है. पर्वत, वृक्ष, लता, गुल्मादि के प्रतीक अस्थियाँ, केश रोम, नदी-नालों की भान्ती नसें, नाडियाँ और धमनियों का जाल बिछा हुआ है-----कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि की समस्त वस्तुएं हूबहू उसी रूप में हमारे इस शरीर में मौजूद हैं. आप इस शरीर को एक प्रकार से ब्राह्मण्ड का नक्शा कह सकते हैं.
.(ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त विवेचन)
ब्राह्मण्ड यदि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश---इन पाँच महाभूतों के मिश्रण का परिणाम है, तो हमारा ये शरीर भी इन्ही के संघात से निर्मित है. ब्राह्मण्ड में सूर्य है तो इस शरीर में सूर्य का प्रतिनिधि आत्मतत्व विद्यमान है, ब्राह्मण्ड में चन्द्रमा है तो शरीर में उसका प्रतीक मन है, ब्राह्मण्ड में मंगल नामक लाल रंग का ग्रह विद्यमान है तो शरीर में विभिन्न रंगों के खाये हुए भोजन के रस से यकृत और पलीहा (जिगर और तिल्ली) द्वारा रंजित, पित्त के रूप में परिणित होने वाला रूधिर(खून)विद्यमान है. ब्राह्मण्ड में बुध,बृहस्पति,शुक्र और शनि नामक ग्रहों की सत्ता है तो हमारे इस शरीर में इन सबके प्रतिनिधि क्रमश:---वाणी, ज्ञान, वीर्य और दु:खानुभूति विद्यमान है. पर्वत, वृक्ष, लता, गुल्मादि के प्रतीक अस्थियाँ, केश रोम, नदी-नालों की भान्ती नसें, नाडियाँ और धमनियों का जाल बिछा हुआ है-----कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि की समस्त वस्तुएं हूबहू उसी रूप में हमारे इस शरीर में मौजूद हैं. आप इस शरीर को एक प्रकार से ब्राह्मण्ड का नक्शा कह सकते हैं.
अहं काको हतो राजन्! हंसाऽहंनिर्मला जल:.........
पुराने समय की बात है। एक राज्य में एक राजा था। किसी कारण से वह अन्य गाँव में जाना चाहता था। एक दिन वह धनुष-बाण सहित पैदल ही चल पड़ा। चलते-चलते राजा थक गया। अत: वह बीच रास्ते में ही एक विशाल पेड़ के नीचे बैठ गया। राजा अपने धनुष-बाण बगल में रखकर, चद्दर ओढ़कर सो गया। थोड़ी ही देर में उसे गहरी नींद लग गई।
उसी पेड़ की खाली डाली पर एक कौआ बैठा था। उसने नीचे सोए हुए राजा पर बीट कर दी। बीट से राजा की चादर गंदी हो गई थी। राजा खर्राटे ले रहा था। उसे पता नहीं चला कि उसकी चादर खराब हो गई है।
कुछ समय के पश्चात कौआ वहाँ से उड़कर चला गया और थोड़ी ही देर में एक हंस उड़ता हुआ आया। हंस उसी डाली पर और उसी जगह पर बैठा, जहाँ पहले वह कौआ बैठा हुआ था अब अचानक राजा की नींद खुली। उठते ही जब उसने अपनी चादर देखी तो वह बीट से गंदी हो चुकी थी।
राजा स्वभाव से बड़ा क्रोधी था। उसकी नजर ऊपर वाली डाली पर गई, जहाँ हंस बैठा हुआ था। राजा ने समझा कि यह सब इसी हंस की ओछी हरकत है। इसी ने मेरी चादर गंदी की है।
क्रोधी राजा ने आव देखा न ताव, ऊपर बैठे हंस को अपना तीखा बाण चलाकर, उसे घायल कर दिया। हंस बेचारा घायल होकर नीचे गिर पड़ा और तड़पने लगा। वह तड़पते हुए राजा से कहने लगा-
'अहं काको हतो राजन्!
हंसाऽहंनिर्मला जल:।
दुष्ट स्थान प्रभावेन,
जातो जन्म निरर्थक।।'
अर्थात हे राजन्! मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया, तुमने मुझे अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया है? मैं तो निर्मल जल में रहने वाला प्राणी हूँ? ईश्वर की कैसी लीला है। सिर्फ एक बार कौए जैसे दुष्ट प्राणी की जगह पर बैठने मात्र से ही व्यर्थ में मेरे प्राण चले जा रहे हैं, फिर दुष्टों के साथ सदा रहने वालों का क्या हाल होता होगा?
हंस ने प्राण छोड़ने से पूर्व कहा - 'हे राजन्! दुष्टों की संगति नहीं करना। क्योंकि उनकी संगति का फल भी ऐसा ही होता है।' राजा को अपने किए अपराध का बोध हो गया। वह अब पश्चाताप करने लगा।
उसी पेड़ की खाली डाली पर एक कौआ बैठा था। उसने नीचे सोए हुए राजा पर बीट कर दी। बीट से राजा की चादर गंदी हो गई थी। राजा खर्राटे ले रहा था। उसे पता नहीं चला कि उसकी चादर खराब हो गई है।
कुछ समय के पश्चात कौआ वहाँ से उड़कर चला गया और थोड़ी ही देर में एक हंस उड़ता हुआ आया। हंस उसी डाली पर और उसी जगह पर बैठा, जहाँ पहले वह कौआ बैठा हुआ था अब अचानक राजा की नींद खुली। उठते ही जब उसने अपनी चादर देखी तो वह बीट से गंदी हो चुकी थी।
राजा स्वभाव से बड़ा क्रोधी था। उसकी नजर ऊपर वाली डाली पर गई, जहाँ हंस बैठा हुआ था। राजा ने समझा कि यह सब इसी हंस की ओछी हरकत है। इसी ने मेरी चादर गंदी की है।
क्रोधी राजा ने आव देखा न ताव, ऊपर बैठे हंस को अपना तीखा बाण चलाकर, उसे घायल कर दिया। हंस बेचारा घायल होकर नीचे गिर पड़ा और तड़पने लगा। वह तड़पते हुए राजा से कहने लगा-
'अहं काको हतो राजन्!
हंसाऽहंनिर्मला जल:।
दुष्ट स्थान प्रभावेन,
जातो जन्म निरर्थक।।'
अर्थात हे राजन्! मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया, तुमने मुझे अपने तीखे बाणों का निशाना बनाया है? मैं तो निर्मल जल में रहने वाला प्राणी हूँ? ईश्वर की कैसी लीला है। सिर्फ एक बार कौए जैसे दुष्ट प्राणी की जगह पर बैठने मात्र से ही व्यर्थ में मेरे प्राण चले जा रहे हैं, फिर दुष्टों के साथ सदा रहने वालों का क्या हाल होता होगा?
हंस ने प्राण छोड़ने से पूर्व कहा - 'हे राजन्! दुष्टों की संगति नहीं करना। क्योंकि उनकी संगति का फल भी ऐसा ही होता है।' राजा को अपने किए अपराध का बोध हो गया। वह अब पश्चाताप करने लगा।
द्रोपदी यदि चुप रहती तो..........
!!...श्री राधे...!!
द्रोपदी यदि चुप रहती तो महाभारत नहीं होता !
सीता यदि बोलतीं तो रामायण की रचना नहीं होती !
इस प्रकार....
हमें क्या नहीं करना चाहिए ...ये महाभारत सिखाता है !
हमें क्या करना चाहिए ....ये रामायण सिखाती है !
द्रोपदी यदि चुप रहती तो महाभारत नहीं होता !
सीता यदि बोलतीं तो रामायण की रचना नहीं होती !
इस प्रकार....
हमें क्या नहीं करना चाहिए ...ये महाभारत सिखाता है !
हमें क्या करना चाहिए ....ये रामायण सिखाती है !
जो भी हिन्दुओं से या हिन्दू धर्म से नफरत करते है उन............
जो भी हिन्दुओं से या हिन्दू धर्म से नफरत करते है उन सभी के लिए सिर्फ एक हिदायत है के हमारे उप्पर कीचड़ डालने से पहले अपने मजहब या धर्म के बारे में सही सही बताये ...अगर हिम्मत नहीं है अपनी पहचान बताने की तो अपनी तोती उर्फ़ बोलती बंद रखे ....क्यों की आप लोगो की बोलने की औकात नहीं वजह साफ़ है आप लोग हिंदुस्तान का कभी भला सोच ही नहीं सकते आप लोगो की नियत यहाँ हिन्दू आई डी बना कर हिन्दू लोगो में ही भेद भाव पैदा करना है ...और जो लोग सच्चे हिन्दू है वो इन लोगो की बात में ना आये !!!
हिन्दी साहित्य की रचना विदेशी आक्रमणोँ, युद्धों तथा गुलामी की परिस्थितियों मेँ हुई.............
हिन्दी साहित्य की रचना विदेशी आक्रमणोँ, युद्धों तथा गुलामी की परिस्थितियों मेँ हुई। मौखिक परम्परा मेँ जो कुछ सामग्री शेष रही, वह भी बहुत तथा भाषा की दृष्टि से इतनी बदल गयी कि उसका मूल रूप ही समाप्त हो गया। इस काल मेँ हिन्दी साहित्य मुख्यत: तीन क्षेत्रोँ से सम्बन्धित रहा है - राज्य, धर्म और लोक। राजदरबार में हिन्दी से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त तो होती है किन्तु रचनाओँ मेँ क्षेपकोँ के बाहुल्य के कारण वीरगाथात्मक रासो ग्रन्थों की प्रामाणिकता समाप्त हो गयी है। धर्म के क्षेत्र में अध्यात्म, भक्ति सम्बन्धी अनेक रचनाएँ प्राप्त होती हैँ, ये अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक हैँ। साहित्य प्रेमियोँ ने बहुत सी हस्तलिखित रचनाओँ को सुरक्षित रखा है तथा बहुत सा साहित्य मौखिक परम्परा में सुरक्षित रखा है।
हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित सामग्री का सँचयन सर्वप्रथम विलियम जोन्स [१७८४ ई.] द्वारा स्थापित बँगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने किया। इसके द्वारा लगभग ६०० संस्कृत तथा हिन्दी ग्रन्थोँ का पता लगाया गया। सोसाइटी की तरफ से डा० ए० टेसिटरी ने खोज कार्य किया, उन्होनेँ ’छन्द रावजयसती’ तथा ’कृष्ण-रुक्मिणी बेलि’ का संपादन भी किया। पश्चात वाराणसी मेँ १८९३ ई. मेँ नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था की सूचनाओँ से इतिहास-रचना के लिये अपरिमित सामग्री उपलब्ध हुई। इस सँस्था से जुड़कर डा० श्यामसुन्दरदास, श्याम बिहारी मिश्र, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, हीरालाल जैन, प० विश्वनाथप्रसाद मिश्र आदि विद्वानों ने खोज कार्य किया।
उन्नीसवीँ शती से पूर्व विभिन्न कवियोँ और लेखकोँ द्वारा अनेक ऎसे ग्रन्थोँ की रचना हो चुकी थी जिनमेँ हिन्दी के विभिन्न कवियोँ के जीवन-वृत्त एवँ कृतित्व का परिचय दिया गया है जैसे- कालिदास कृत "हजारा’[१७१८], बलदेवकृत ’सत्कविगिरा विलास"[१७४६], सुब्बासिँह कृत ’विद्वन्मोदतरँगिणी’[१८१७], कृष्णान्न्द व्यासदेव कृत "रागसागरोद्भव" और "रागकल्पद्रुम"[१८४३], सरदारकवि कृत "श्रंगार संग्रह"[१८४८], भारतेन्दु कृत "सुन्दरी तिलक"[१८६९] आदि -- किन्तु इनमेँ काल-क्रम, सन-सम्वत आदि का अभाव होने के कारण इन्हें इतिहास की सँज्ञा नहीँ दी जा सकती।
वस्तुत: हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का पहला प्रयास एक फ्रेँच विद्वान "गार्सां द तासी" ने किया। जिन्होँने फ्रेँच भाषा मेँ "हस्त्वार द ला लितरेत्युर ऎन्दुई ऎन्दुस्तानी" ग्रन्थ लिखा। इस ग्रन्थ में हिन्दी और उर्दू के ज्ञात कवियोँ का विवरण अकारादि क्रम से दिया गया है। इसका प्रथम भाग १८३९ ई. में तथा द्वितीय भाग १८४७ ई. में प्रकाशित हुआ, फिर १८७१ ई. में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। तासी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शिव सिंह सेँगर ने १८८३ ई. मेँ "शिव सिँह सरोज" की रचना की। इस ग्रन्थ में लगभग १००० कवियोँ कवियोँ का जीवन-चरित्र एवँ उनकी कृतियोँ के नमूने प्रस्तुत किये गये हैँ।
सन १८८८ में एशियाटिक सोसायटी आफ़ बँगाल की पत्रिका के विशेषाँक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित "द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर आफ़ हिन्दुस्तान" का प्रकाशन हुआ, जो नाम से इतिहास न होते हुए भी हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जा सकता है। इसमेँ लेखक ने कवियोँ और लेखकोँ का कालक्रमानुसार वर्गीकरण करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इतिहास मेँ कवियोँ को अँक देने वाली प्रणाली ग्रियर्सन की देन है। सोलहवीँ-सत्रहवीँ शताब्दी के काव्य को "स्वर्ण-युग" की संज्ञा देने वाले ग्रियर्सन ही हैँ। सामग्री को यथासम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना, प्रत्येक काल के शेष कवियोँ का अध्यायविशेष के अन्त में उल्लेख करना, सम्बन्धित साँस्कृतिक परिस्थितियों और प्रेरणा-स्रोतोँ का उदघाटन करना, हिन्दी साहित्य के विकास-क्रम का निर्धारण - चारण-काव्य, धार्मिक-काव्य, प्रेम-काव्य और दरबारी-काव्य के रूप में करना - आदि ग्रियर्सन की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैँ।
हिन्दी-साहित्येतिहास की परम्परा में मिश्रबन्धुओँ द्वारा रचित "मिश्रबन्धु विनोद" उल्लेख्नीय है। यह चार भागोँ मेँ विभक्त है। प्रथम तीन भाग १९१३ ई. मेँ प्रकाशित हुए तथा चतुर्थ भाग १९३४ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमेँ लगभग पांच हजार कवियों को स्थान दिया गया है और इसे आठ से भी अधिक कालखण्डों में विभाजित किया गया है। इतिहास के रूप मेँ इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमेँ कवियों के विवरणोँ के साथ-साथ साहित्य के विविध अँगोँ पर प्रकाश डाला गया है। कवियोँ की जीवनी तथा आलोचनाओँ के विवरण संग्रहीत किये गये हैँ। कवियोँ का सापेक्षिक महत्व निर्धारित करने के लिये उनकी श्रेणियाँ भी बनाई गयीँ हैँ। काव्य समीक्षा के क्षेत्र में परम्परागत पद्धति ही ग्रहीत हुई है। अधिकाँश परवर्ती इतिहासकारोँ ने इस इतिहास-ग्रन्थ का आश्रय ग्रहण किया है।
सन १९२९ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रन्थ "हिन्दी साहित्य का इतिहास" लिखा, जो मूलत: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित "हिन्दी- शब्द-सागर" की भूमिका में लिखा गया था, जिसे बाद मेँ पुस्तक का रूप दिया गया। इसके प्रारम्भ मेँ आचार्य शुक्ल ने लिखा -- " जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का सँचित प्रतिविम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीँ चित्तवृत्तियोँ की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामँजस्य दिखाना ही "साहित्य का इतिहास" कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत-कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"
आचार्य शुक्ल ने हिन्दी का आविर्भाव काल सातवीँ शताब्दी से मानते हुए भी हिन्दी साहित्य का आरम्भ विक्रमी सँ० १०५० से माना तथा सम्पूर्ण हिन्दी साहित्येतिहास को चार काल-खण्डोँ मेँ विभक्त किया। प्रत्येक काल का नामकरण उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर ही किया। आचार्य शुक्ल ने कवियोँ और साहित्यकारोँ के जीवन-चरित सम्बन्धी इतिवृत्त के स्थान पर उनकी रचनाओँ के साहित्यिक मूल्याँकन को प्रमुखता दी है। इस क्षेत्र मेँ उन्होँने चुने हुए कवियोँ को ही लिया है और उनके विवेचन मेँ उनकी साहित्यिक महत्ता व लघुता का ध्यान रखते हुए उन्हेँ तदनुसार ही स्थान दिया है। आचार्य द्वारा इतिहास की रचना उस समय हुई थी जबकि हिन्दी का अधिकाँश प्राचीन साहित्य अज्ञात, लुप्त एवँ अप्रकाशित अवस्था मेँ पड़ा हुआ था, उसका प्रामाणिक अध्यन-विश्लेषण नहीँ हो पाया था। उस युग की सीमित सामग्री को जो रूप उन्होँने विवेचनात्मक तौर पर दिया है, वह निश्चय ही उनकी स्वतँत्र चेतना एवँ विवेचना शक्ति का परिचायक है। उनका रसवादी सिद्धाँत लोकमँगल भावना की कसौटी, काव्य मेँ मानव-समाज का प्रतिविम्ब तथा साहित्यिक धारा को विकसित करने वाली शक्तियोँ का विश्लेषण आदि काव्य, कवि तथा युग के उत्कर्ष के निर्धारण के आधार रूप मेँ गृहीत हुए हैँ। विभिन्न काव्यधाराओँ और युगोँ की साहित्यिक प्रवृत्तियोँ के निर्धारण मेँ उन्हेँ सफलता प्राप्त हुई है। उन्होँने भक्ति काल को चार भागोँ मेँ बाँटा है - पहले निर्गुण-धारा और सगुण-धारा मेँ फिर प्रत्येक को दो-दो शाखाओँ - ज्ञानाश्रयी शाखा व प्रेमाश्रयी शाखा तथा रामभक्तिशाखा व कृष्णभक्तिशाखा मेँ। रीतिग्रन्थकारोँ के आचार्यत्व एवँ कवित्व का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उनकी उपलब्धियोँ तथा सीमाओँ के सम्बन्ध मेँ जो निर्णय आचार्य शुक्ल ने दिये, वे बहुत कुछ अँशोँ मेँ आज भी मान्य हैँ। भक्तिकाल की ही भाँति रीतिकाल मेँ भी नामकरण, सीमा-निर्धारण, परम्पराओँ व काव्यधाराओँ का वर्गीकरण वर्गविशेष के एकपक्षीय बोध का सूचक है जिससे इस काल के रीतिमुक्त प्रेममार्गी कवियोँ, वीररसात्मक काव्योँ के रचयिताओँ तथा राजनीति एवँ वैराग्य सम्बन्धी मुक्तकोँ के रचयिता कवियोँ के साथ न्याय नहीँ हो पाता। उन्होँने साहित्यिक परम्पराओँ और प्रवृत्तियोँ को युगविशेष की चित्तवृत्ति के प्रतिविम्ब के रूप में ही ग्रहण किया, उन तत्त्वोँ और स्रोतोँ की उपेक्षा की जिनका सम्बन्ध पूर्व प्रम्परा से है। परिणाम यह हुआ कि उन्होँने पूरे मध्यकाल की विभिन्न धाराओँ और प्रवृत्तियोँ को तदयुगीन मुस्लिम प्रभाव की देन के रूप मेँ स्वीकार कर लिया - जैसे भक्ति-आँदोलन तदयुगीन निराशा की देन है, सँत-मत इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव का सूचक है, प्रेमाख्यान-परम्परा सूफी मसनवियों से अनुकृत है, आदि। वस्तुत: सँस्कृत साहित्य की पौराणिक परम्पराओँ, प्राकृत-अपभ्रँश के प्रेमाख्यानोँ व मुक्तकोँ की धाराओँ, सिद्धोँ व नाथपँथियोँ की गुह्य वाणियोँ की उपेक्षा करके मध्यकालीन हिन्दी-काव्य की विभिन्न काव्यधाराओँ के वर्तमान स्वरूप की आलोचना भले की जा सके, किन्तु उसके आधार-स्रोतोँ का अनुसन्धान और उनके विकास-क्रम की ऎतिहासिक व्याख्या सम्भव नहीँ है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने अपने ग्रन्थ "हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास" मेँ भाषा और साहित्य का आलोचनापरक विकास प्रदर्शित किया है। उन्होँने स्वदेशी साहित्य की महिमा का गुणगान किया है।
आचार्य शुक्ल के लगभग एक दशाब्दी बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "हिन्दी साहित्य की भूमिका" प्रस्तुत की। इसमेँ आचार्य द्विवेदी ने परम्परा का महत्व स्थापित करते हुए उन धारणाओँ का खण्डन किया, जो युगीन प्रभाव के एकाँगी दृष्टिकोण पर आधारित थीँ। "हिन्दी साहित्य की भूमिका" के अनन्तर आचार्य द्विवेदी की "हिन्दी साहित्य: उदभव और विकास", "हिन्दी साहित्य का आदिकाल" आदि इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ प्रकाशित हुईँ। हिन्दी साहित्य के इतिहास को विशेषत: मध्यकालीन काव्य के स्रोतोँ व पूर्व परम्पराओँ के अनुसँधान तथा उनकी अधिक सहानुभूतिपूर्ण व यथातथ्य व्याख्या करने की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी का योगदान अप्रतिम है। आचार्य शुक्ल की अनेक धारणाओँ और स्थापनाओँ को सबल प्रमाणोँ के आधार पर उन्होँने खण्डित किया है। निष्कर्ष रूप मेँ जहाँ द्विवेदीजी ने परम्परा पर बल दिया है, वहाँ आचार्य शुक्ल ने युग-स्थिति पर, अत: दोनोँ विद्वानोँ के मत परस्पर पूरक हैँ।
आचार्य द्विवेदी के साथ-साथ ही इस क्षेत्र मेँ डा० रामकुमार वर्मा अवतरित हुए। इनका "हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" सन १९३८ ई. मेँ प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ मेँ सँ० ७५० से १७५० विक्रमी तक की कालावधि को ही ग्रहण किया गया है। डा० वर्मा ने इतिहास को सात वर्गोँ मेँ विभक्त किया है। उन्होँने स्वयँभू को हिन्दी का पहला कवि मानते हुए हिन्दी साहित्य का आरम्भ सँ० ७५० विक्रमी से स्वीकार किया है। काल-विभाजन एवँ नामकरण करने मेँ आचार्य शुक्ल का अनुसरण किँचित परिवर्तन के साथ किया है। अनेक कवियोँ के काव्य-सौन्दर्य का आख्यान करते समय डा० वर्मा की लेखनी काव्यमय हो उठी है। शैली की सरसता एवँ प्रवाहात्मकता के कारण इनका इतिहास लोकप्रिय हुआ है।
सन १९३५ मेँ डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ने "हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" लिखा। डा० सुमनराजे इन्हेँ साहित्य मेँ वैज्ञानिक पद्धति का अनुसँधाता एवँ प्रयोक्ता मानती हैँ। डा० गुप्त ने हिन्दी के प्रथम कवि के रूप मेँ "भरतेश्वर बाहुबली" के रचयिता शालिभद्र सूरि को मान्यता दी है। वे बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो आदि को १३५० ई. के पूर्व की रचना मानते हुए भी विकास-क्रम मेँ मध्यकाल की निश्चित सीमा स्वीकार करते हैँ। जिससे इसमेँ चरितकाव्योँ का निर्णय, सूफी काव्य परम्परा और नाथपँथ का समुचित विवेचन नहीँ हुआ है। स्वातँत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य को सही पृष्ठभूमि नहीँ उपलब्ध हो पायी है।
डा० रामखेलावन पाण्डेय ने "हिन्दी साहित्य का नया इतिहास" नामक ग्रन्थ लिखा। इनका साहित्येतिहास सम्बन्धी विचार नवीन तथा कलात्मक है। इनका कहना है कि उन अंतरँग वृत्तियोँ और स्थितियोँ का अन्वेषण करना होगा, जिनके माध्यम से निर्दिष्टि अवधि की अँतरंग साँस्कृतिक चेतना और साहित्य-बोध की निर्दिष्टता की जा सके।
अन्य परवर्ती इतिहासकारोँ ने कुछ ऎसे शोध प्रबन्ध व समीक्षापरक ग्रन्थ लिखे जो हिन्दी साहित्य के इतिहास की आँशिक रूप मेँ नूतन व्याख्या प्रस्तुत करते हैँ। डा० मोतीलाल मेनारिया कृत "राजस्थानी भाषा और साहित्य", डा० वासुदेवसिँह कृत "हिन्दी साहित्य का उदभवकाल", परशुराम चतुर्वेदी कृत "उत्तरी भारत की सँत परम्परा", डा० विजयेन्द्र स्नातक का "राधावल्ल्भ सम्प्रदाय और उसका साहित्य", पँ० विश्वनाथप्रसाद मिश्र का "हिन्दी साहित्य का अतीत", श्री चन्द्रकाँत बाली का "पँजाब-प्रांतीय हिन्दी साहित्य का इतिहास", डा० टीकमसिँह तोमर का "हिन्दी वीरकाव्य", डा० केसरी नारायण शुक्ल, डा० श्री कृष्णलाल, डा० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय एवँ भोलानाथ तिवारी के आधुनिक काल सम्बन्धी विभिन्न शोध-प्रबन्ध, डा० सियाराम तिवारी का "मध्यकालीन खण्डकाव्य", डा० इन्द्रपालसिँह का "रीति कालीन प्रबन्ध काव्य", डा० सरला शुक्ल और डा० हरिकान्त श्रीवास्तव आदि के प्रेमाख्यान सम्बन्धी शोध प्रबन्ध आदि महत्वपूर्ण हैँ।
कालविशेष के इतिहास-लेखन की परम्परा मेँ डा० बच्चनसिँह ने "आधुनिक साहित्य का इतिहास" लिखा है। कुछ विद्वानोँ ने साहित्येतिहास के सैद्धान्तिक एवँ व्यवहारिक पक्षोँ तथा उसके विभिन्न काल-खण्डोँ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालने उद्देश्य से अनेक नूतन प्रयास किये हैँ, जिनमेँ डा० सुमनराजे की "साहित्येतिहास: सँरचना और स्वरूप", डा० राममूर्ति त्रिपाठी की "आदिकालीन हिन्दी साहित्य की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि", डा० शिव कुमार मिश्र की "हिन्दी साहित्येतिहास के सिद्धान्त", डाओ शम्भूनाथसिँह की "हिन्दी साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि" आदि कृतियाँ विशेषत: उल्लेखनीय हैँ।
इस प्रकार ज्योँ-ज्योँ साहित्य-लेखन की परम्परा आगे बढ़ती जाती है तथा साहित्यानुसँधान के क्षेत्र मेँ नये-नये तथ्योँ का उदघाटन होता जा रहा है, त्योँ-त्योँ साहित्येतिहासकार का कार्य भी गुरुतर होता जा रहा है। हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा सर्वथा नवीन ऎतिहासिक दृष्टि को खोजती और प्राप्त करती हुई नव-तत्व विवेचन की ओर अप्रतिहत रूप से अग्रसर है। नित्य नवीनता की उपलब्धि एवँ उसका वैज्ञानिक आकलन ही साहित्यकार का विशिष्ट दायित्व है।
हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित सामग्री का सँचयन सर्वप्रथम विलियम जोन्स [१७८४ ई.] द्वारा स्थापित बँगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने किया। इसके द्वारा लगभग ६०० संस्कृत तथा हिन्दी ग्रन्थोँ का पता लगाया गया। सोसाइटी की तरफ से डा० ए० टेसिटरी ने खोज कार्य किया, उन्होनेँ ’छन्द रावजयसती’ तथा ’कृष्ण-रुक्मिणी बेलि’ का संपादन भी किया। पश्चात वाराणसी मेँ १८९३ ई. मेँ नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था की सूचनाओँ से इतिहास-रचना के लिये अपरिमित सामग्री उपलब्ध हुई। इस सँस्था से जुड़कर डा० श्यामसुन्दरदास, श्याम बिहारी मिश्र, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, हीरालाल जैन, प० विश्वनाथप्रसाद मिश्र आदि विद्वानों ने खोज कार्य किया।
उन्नीसवीँ शती से पूर्व विभिन्न कवियोँ और लेखकोँ द्वारा अनेक ऎसे ग्रन्थोँ की रचना हो चुकी थी जिनमेँ हिन्दी के विभिन्न कवियोँ के जीवन-वृत्त एवँ कृतित्व का परिचय दिया गया है जैसे- कालिदास कृत "हजारा’[१७१८], बलदेवकृत ’सत्कविगिरा विलास"[१७४६], सुब्बासिँह कृत ’विद्वन्मोदतरँगिणी’[१८१७], कृष्णान्न्द व्यासदेव कृत "रागसागरोद्भव" और "रागकल्पद्रुम"[१८४३], सरदारकवि कृत "श्रंगार संग्रह"[१८४८], भारतेन्दु कृत "सुन्दरी तिलक"[१८६९] आदि -- किन्तु इनमेँ काल-क्रम, सन-सम्वत आदि का अभाव होने के कारण इन्हें इतिहास की सँज्ञा नहीँ दी जा सकती।
वस्तुत: हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का पहला प्रयास एक फ्रेँच विद्वान "गार्सां द तासी" ने किया। जिन्होँने फ्रेँच भाषा मेँ "हस्त्वार द ला लितरेत्युर ऎन्दुई ऎन्दुस्तानी" ग्रन्थ लिखा। इस ग्रन्थ में हिन्दी और उर्दू के ज्ञात कवियोँ का विवरण अकारादि क्रम से दिया गया है। इसका प्रथम भाग १८३९ ई. में तथा द्वितीय भाग १८४७ ई. में प्रकाशित हुआ, फिर १८७१ ई. में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। तासी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शिव सिंह सेँगर ने १८८३ ई. मेँ "शिव सिँह सरोज" की रचना की। इस ग्रन्थ में लगभग १००० कवियोँ कवियोँ का जीवन-चरित्र एवँ उनकी कृतियोँ के नमूने प्रस्तुत किये गये हैँ।
सन १८८८ में एशियाटिक सोसायटी आफ़ बँगाल की पत्रिका के विशेषाँक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित "द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर आफ़ हिन्दुस्तान" का प्रकाशन हुआ, जो नाम से इतिहास न होते हुए भी हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जा सकता है। इसमेँ लेखक ने कवियोँ और लेखकोँ का कालक्रमानुसार वर्गीकरण करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इतिहास मेँ कवियोँ को अँक देने वाली प्रणाली ग्रियर्सन की देन है। सोलहवीँ-सत्रहवीँ शताब्दी के काव्य को "स्वर्ण-युग" की संज्ञा देने वाले ग्रियर्सन ही हैँ। सामग्री को यथासम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना, प्रत्येक काल के शेष कवियोँ का अध्यायविशेष के अन्त में उल्लेख करना, सम्बन्धित साँस्कृतिक परिस्थितियों और प्रेरणा-स्रोतोँ का उदघाटन करना, हिन्दी साहित्य के विकास-क्रम का निर्धारण - चारण-काव्य, धार्मिक-काव्य, प्रेम-काव्य और दरबारी-काव्य के रूप में करना - आदि ग्रियर्सन की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैँ।
हिन्दी-साहित्येतिहास की परम्परा में मिश्रबन्धुओँ द्वारा रचित "मिश्रबन्धु विनोद" उल्लेख्नीय है। यह चार भागोँ मेँ विभक्त है। प्रथम तीन भाग १९१३ ई. मेँ प्रकाशित हुए तथा चतुर्थ भाग १९३४ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमेँ लगभग पांच हजार कवियों को स्थान दिया गया है और इसे आठ से भी अधिक कालखण्डों में विभाजित किया गया है। इतिहास के रूप मेँ इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमेँ कवियों के विवरणोँ के साथ-साथ साहित्य के विविध अँगोँ पर प्रकाश डाला गया है। कवियोँ की जीवनी तथा आलोचनाओँ के विवरण संग्रहीत किये गये हैँ। कवियोँ का सापेक्षिक महत्व निर्धारित करने के लिये उनकी श्रेणियाँ भी बनाई गयीँ हैँ। काव्य समीक्षा के क्षेत्र में परम्परागत पद्धति ही ग्रहीत हुई है। अधिकाँश परवर्ती इतिहासकारोँ ने इस इतिहास-ग्रन्थ का आश्रय ग्रहण किया है।
सन १९२९ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रन्थ "हिन्दी साहित्य का इतिहास" लिखा, जो मूलत: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित "हिन्दी- शब्द-सागर" की भूमिका में लिखा गया था, जिसे बाद मेँ पुस्तक का रूप दिया गया। इसके प्रारम्भ मेँ आचार्य शुक्ल ने लिखा -- " जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का सँचित प्रतिविम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीँ चित्तवृत्तियोँ की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामँजस्य दिखाना ही "साहित्य का इतिहास" कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत-कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"
आचार्य शुक्ल ने हिन्दी का आविर्भाव काल सातवीँ शताब्दी से मानते हुए भी हिन्दी साहित्य का आरम्भ विक्रमी सँ० १०५० से माना तथा सम्पूर्ण हिन्दी साहित्येतिहास को चार काल-खण्डोँ मेँ विभक्त किया। प्रत्येक काल का नामकरण उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर ही किया। आचार्य शुक्ल ने कवियोँ और साहित्यकारोँ के जीवन-चरित सम्बन्धी इतिवृत्त के स्थान पर उनकी रचनाओँ के साहित्यिक मूल्याँकन को प्रमुखता दी है। इस क्षेत्र मेँ उन्होँने चुने हुए कवियोँ को ही लिया है और उनके विवेचन मेँ उनकी साहित्यिक महत्ता व लघुता का ध्यान रखते हुए उन्हेँ तदनुसार ही स्थान दिया है। आचार्य द्वारा इतिहास की रचना उस समय हुई थी जबकि हिन्दी का अधिकाँश प्राचीन साहित्य अज्ञात, लुप्त एवँ अप्रकाशित अवस्था मेँ पड़ा हुआ था, उसका प्रामाणिक अध्यन-विश्लेषण नहीँ हो पाया था। उस युग की सीमित सामग्री को जो रूप उन्होँने विवेचनात्मक तौर पर दिया है, वह निश्चय ही उनकी स्वतँत्र चेतना एवँ विवेचना शक्ति का परिचायक है। उनका रसवादी सिद्धाँत लोकमँगल भावना की कसौटी, काव्य मेँ मानव-समाज का प्रतिविम्ब तथा साहित्यिक धारा को विकसित करने वाली शक्तियोँ का विश्लेषण आदि काव्य, कवि तथा युग के उत्कर्ष के निर्धारण के आधार रूप मेँ गृहीत हुए हैँ। विभिन्न काव्यधाराओँ और युगोँ की साहित्यिक प्रवृत्तियोँ के निर्धारण मेँ उन्हेँ सफलता प्राप्त हुई है। उन्होँने भक्ति काल को चार भागोँ मेँ बाँटा है - पहले निर्गुण-धारा और सगुण-धारा मेँ फिर प्रत्येक को दो-दो शाखाओँ - ज्ञानाश्रयी शाखा व प्रेमाश्रयी शाखा तथा रामभक्तिशाखा व कृष्णभक्तिशाखा मेँ। रीतिग्रन्थकारोँ के आचार्यत्व एवँ कवित्व का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उनकी उपलब्धियोँ तथा सीमाओँ के सम्बन्ध मेँ जो निर्णय आचार्य शुक्ल ने दिये, वे बहुत कुछ अँशोँ मेँ आज भी मान्य हैँ। भक्तिकाल की ही भाँति रीतिकाल मेँ भी नामकरण, सीमा-निर्धारण, परम्पराओँ व काव्यधाराओँ का वर्गीकरण वर्गविशेष के एकपक्षीय बोध का सूचक है जिससे इस काल के रीतिमुक्त प्रेममार्गी कवियोँ, वीररसात्मक काव्योँ के रचयिताओँ तथा राजनीति एवँ वैराग्य सम्बन्धी मुक्तकोँ के रचयिता कवियोँ के साथ न्याय नहीँ हो पाता। उन्होँने साहित्यिक परम्पराओँ और प्रवृत्तियोँ को युगविशेष की चित्तवृत्ति के प्रतिविम्ब के रूप में ही ग्रहण किया, उन तत्त्वोँ और स्रोतोँ की उपेक्षा की जिनका सम्बन्ध पूर्व प्रम्परा से है। परिणाम यह हुआ कि उन्होँने पूरे मध्यकाल की विभिन्न धाराओँ और प्रवृत्तियोँ को तदयुगीन मुस्लिम प्रभाव की देन के रूप मेँ स्वीकार कर लिया - जैसे भक्ति-आँदोलन तदयुगीन निराशा की देन है, सँत-मत इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव का सूचक है, प्रेमाख्यान-परम्परा सूफी मसनवियों से अनुकृत है, आदि। वस्तुत: सँस्कृत साहित्य की पौराणिक परम्पराओँ, प्राकृत-अपभ्रँश के प्रेमाख्यानोँ व मुक्तकोँ की धाराओँ, सिद्धोँ व नाथपँथियोँ की गुह्य वाणियोँ की उपेक्षा करके मध्यकालीन हिन्दी-काव्य की विभिन्न काव्यधाराओँ के वर्तमान स्वरूप की आलोचना भले की जा सके, किन्तु उसके आधार-स्रोतोँ का अनुसन्धान और उनके विकास-क्रम की ऎतिहासिक व्याख्या सम्भव नहीँ है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने अपने ग्रन्थ "हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास" मेँ भाषा और साहित्य का आलोचनापरक विकास प्रदर्शित किया है। उन्होँने स्वदेशी साहित्य की महिमा का गुणगान किया है।
आचार्य शुक्ल के लगभग एक दशाब्दी बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "हिन्दी साहित्य की भूमिका" प्रस्तुत की। इसमेँ आचार्य द्विवेदी ने परम्परा का महत्व स्थापित करते हुए उन धारणाओँ का खण्डन किया, जो युगीन प्रभाव के एकाँगी दृष्टिकोण पर आधारित थीँ। "हिन्दी साहित्य की भूमिका" के अनन्तर आचार्य द्विवेदी की "हिन्दी साहित्य: उदभव और विकास", "हिन्दी साहित्य का आदिकाल" आदि इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ प्रकाशित हुईँ। हिन्दी साहित्य के इतिहास को विशेषत: मध्यकालीन काव्य के स्रोतोँ व पूर्व परम्पराओँ के अनुसँधान तथा उनकी अधिक सहानुभूतिपूर्ण व यथातथ्य व्याख्या करने की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी का योगदान अप्रतिम है। आचार्य शुक्ल की अनेक धारणाओँ और स्थापनाओँ को सबल प्रमाणोँ के आधार पर उन्होँने खण्डित किया है। निष्कर्ष रूप मेँ जहाँ द्विवेदीजी ने परम्परा पर बल दिया है, वहाँ आचार्य शुक्ल ने युग-स्थिति पर, अत: दोनोँ विद्वानोँ के मत परस्पर पूरक हैँ।
आचार्य द्विवेदी के साथ-साथ ही इस क्षेत्र मेँ डा० रामकुमार वर्मा अवतरित हुए। इनका "हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" सन १९३८ ई. मेँ प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ मेँ सँ० ७५० से १७५० विक्रमी तक की कालावधि को ही ग्रहण किया गया है। डा० वर्मा ने इतिहास को सात वर्गोँ मेँ विभक्त किया है। उन्होँने स्वयँभू को हिन्दी का पहला कवि मानते हुए हिन्दी साहित्य का आरम्भ सँ० ७५० विक्रमी से स्वीकार किया है। काल-विभाजन एवँ नामकरण करने मेँ आचार्य शुक्ल का अनुसरण किँचित परिवर्तन के साथ किया है। अनेक कवियोँ के काव्य-सौन्दर्य का आख्यान करते समय डा० वर्मा की लेखनी काव्यमय हो उठी है। शैली की सरसता एवँ प्रवाहात्मकता के कारण इनका इतिहास लोकप्रिय हुआ है।
सन १९३५ मेँ डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ने "हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" लिखा। डा० सुमनराजे इन्हेँ साहित्य मेँ वैज्ञानिक पद्धति का अनुसँधाता एवँ प्रयोक्ता मानती हैँ। डा० गुप्त ने हिन्दी के प्रथम कवि के रूप मेँ "भरतेश्वर बाहुबली" के रचयिता शालिभद्र सूरि को मान्यता दी है। वे बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो आदि को १३५० ई. के पूर्व की रचना मानते हुए भी विकास-क्रम मेँ मध्यकाल की निश्चित सीमा स्वीकार करते हैँ। जिससे इसमेँ चरितकाव्योँ का निर्णय, सूफी काव्य परम्परा और नाथपँथ का समुचित विवेचन नहीँ हुआ है। स्वातँत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य को सही पृष्ठभूमि नहीँ उपलब्ध हो पायी है।
डा० रामखेलावन पाण्डेय ने "हिन्दी साहित्य का नया इतिहास" नामक ग्रन्थ लिखा। इनका साहित्येतिहास सम्बन्धी विचार नवीन तथा कलात्मक है। इनका कहना है कि उन अंतरँग वृत्तियोँ और स्थितियोँ का अन्वेषण करना होगा, जिनके माध्यम से निर्दिष्टि अवधि की अँतरंग साँस्कृतिक चेतना और साहित्य-बोध की निर्दिष्टता की जा सके।
अन्य परवर्ती इतिहासकारोँ ने कुछ ऎसे शोध प्रबन्ध व समीक्षापरक ग्रन्थ लिखे जो हिन्दी साहित्य के इतिहास की आँशिक रूप मेँ नूतन व्याख्या प्रस्तुत करते हैँ। डा० मोतीलाल मेनारिया कृत "राजस्थानी भाषा और साहित्य", डा० वासुदेवसिँह कृत "हिन्दी साहित्य का उदभवकाल", परशुराम चतुर्वेदी कृत "उत्तरी भारत की सँत परम्परा", डा० विजयेन्द्र स्नातक का "राधावल्ल्भ सम्प्रदाय और उसका साहित्य", पँ० विश्वनाथप्रसाद मिश्र का "हिन्दी साहित्य का अतीत", श्री चन्द्रकाँत बाली का "पँजाब-प्रांतीय हिन्दी साहित्य का इतिहास", डा० टीकमसिँह तोमर का "हिन्दी वीरकाव्य", डा० केसरी नारायण शुक्ल, डा० श्री कृष्णलाल, डा० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय एवँ भोलानाथ तिवारी के आधुनिक काल सम्बन्धी विभिन्न शोध-प्रबन्ध, डा० सियाराम तिवारी का "मध्यकालीन खण्डकाव्य", डा० इन्द्रपालसिँह का "रीति कालीन प्रबन्ध काव्य", डा० सरला शुक्ल और डा० हरिकान्त श्रीवास्तव आदि के प्रेमाख्यान सम्बन्धी शोध प्रबन्ध आदि महत्वपूर्ण हैँ।
कालविशेष के इतिहास-लेखन की परम्परा मेँ डा० बच्चनसिँह ने "आधुनिक साहित्य का इतिहास" लिखा है। कुछ विद्वानोँ ने साहित्येतिहास के सैद्धान्तिक एवँ व्यवहारिक पक्षोँ तथा उसके विभिन्न काल-खण्डोँ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालने उद्देश्य से अनेक नूतन प्रयास किये हैँ, जिनमेँ डा० सुमनराजे की "साहित्येतिहास: सँरचना और स्वरूप", डा० राममूर्ति त्रिपाठी की "आदिकालीन हिन्दी साहित्य की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि", डा० शिव कुमार मिश्र की "हिन्दी साहित्येतिहास के सिद्धान्त", डाओ शम्भूनाथसिँह की "हिन्दी साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि" आदि कृतियाँ विशेषत: उल्लेखनीय हैँ।
इस प्रकार ज्योँ-ज्योँ साहित्य-लेखन की परम्परा आगे बढ़ती जाती है तथा साहित्यानुसँधान के क्षेत्र मेँ नये-नये तथ्योँ का उदघाटन होता जा रहा है, त्योँ-त्योँ साहित्येतिहासकार का कार्य भी गुरुतर होता जा रहा है। हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा सर्वथा नवीन ऎतिहासिक दृष्टि को खोजती और प्राप्त करती हुई नव-तत्व विवेचन की ओर अप्रतिहत रूप से अग्रसर है। नित्य नवीनता की उपलब्धि एवँ उसका वैज्ञानिक आकलन ही साहित्यकार का विशिष्ट दायित्व है।
वैभवं कामये न धनं कामये....................
वैभवं कामये न धनं कामये
केवलं कामिनी दर्शनं कामये
सृष्टि कार्येण तुष्टोस्म्यहं यद्यपि
चापि सौन्दर्य संवर्धनं कामये।
रेलयाने स्थिता उच्च शयनासने
मुक्त केशांगना अस्त व्यस्तासने
शोभिता तत्र सर्वांग आन्दोलिता
अनवरत यान परिचालनं कामये।
सैव मिलिता सड़क परिवहन वाहने
पंक्ति बद्धाः वयं यात्रि संमर्दने
मम समक्षे स्थिता श्रोणि वक्षोन्नता
अप्रयासांग स्पर्शनं कामये।
सैव दृष्टा मया अद्य नद्यास्तटे
सा जलान्निर्गता भाति क्लेदित पटे
दृशयते यादृशा शाटिकालिंगिता
तादृशम् एव आलिंगनं कामये।
एकदा मध्य नगरे स्थिते उपवने
अर्धकेशामपश्यम् लता मण्डपे
आंग्ल शवानेन सह खेलयन्ती तदा
अहमपि श्वानवत् क्रीडनं कामये।
नित्य पश्याम्यहं हाटके परिभ्रमन्
तां लिपिष्टकाधरोष्ठी कटाक्ष चालयन्
अतिमनोहारिणीं मारुति गामिनीम्
अंग प्रत्यंग आघातनं कामये।
स्कूटी यानेन गच्छति स्वकार्यालयं
अस्ति मार्गे वृहद् गत्यवरोधकम्
दृश्यते कूर्दयन् वक्ष पक्षी द्वयं
पथिषु सर्वत्र अवरोधकम् कामये।
केवलं कामिनी दर्शनं कामये
सृष्टि कार्येण तुष्टोस्म्यहं यद्यपि
चापि सौन्दर्य संवर्धनं कामये।
रेलयाने स्थिता उच्च शयनासने
मुक्त केशांगना अस्त व्यस्तासने
शोभिता तत्र सर्वांग आन्दोलिता
अनवरत यान परिचालनं कामये।
सैव मिलिता सड़क परिवहन वाहने
पंक्ति बद्धाः वयं यात्रि संमर्दने
मम समक्षे स्थिता श्रोणि वक्षोन्नता
अप्रयासांग स्पर्शनं कामये।
सैव दृष्टा मया अद्य नद्यास्तटे
सा जलान्निर्गता भाति क्लेदित पटे
दृशयते यादृशा शाटिकालिंगिता
तादृशम् एव आलिंगनं कामये।
एकदा मध्य नगरे स्थिते उपवने
अर्धकेशामपश्यम् लता मण्डपे
आंग्ल शवानेन सह खेलयन्ती तदा
अहमपि श्वानवत् क्रीडनं कामये।
नित्य पश्याम्यहं हाटके परिभ्रमन्
तां लिपिष्टकाधरोष्ठी कटाक्ष चालयन्
अतिमनोहारिणीं मारुति गामिनीम्
अंग प्रत्यंग आघातनं कामये।
स्कूटी यानेन गच्छति स्वकार्यालयं
अस्ति मार्गे वृहद् गत्यवरोधकम्
दृश्यते कूर्दयन् वक्ष पक्षी द्वयं
पथिषु सर्वत्र अवरोधकम् कामये।
हे सखि पतिगृहगमनं..............
हे सखि पतिगृहगमनं
प्रथमसुखदमपि किंत्वतिक्लिष्टं री।
परितो नूतन वातावरणे
वासम् कार्यविशिष्टं री।।
वदने सति अवरुद्धति कण्ठं
दिवसे अवगुण्ठनमाकण्ठं।
केवलमार्य त्यक्त्वा तत्र
किंञ्चिदपि मया न दृष्टं री।।
वंश पुरातन प्रथानुसरणं
नित्यं मर्यादितमाचरणं।
परिजन सकल भिन्न निर्देश पालने
प्रभवति कष्टं री।।
भर्तुर्पितरौ भगिनी भ्राता
खलु प्रत्येकः क्लेश विधाता।
सहसा प्रियतममुखं विलोक्य तु
सर्वं कष्ट विनिष्टं री।।
अभवत् कठिनं दिवावसानम्
बहु प्रतीक्षितं रजन्यागमनम्।
लज्जया किञ्च कथं कथयानि
विशिष्ट प्रणयपरिशिष्टं री।।
प्रथमसुखदमपि किंत्वतिक्लिष्टं री।
परितो नूतन वातावरणे
वासम् कार्यविशिष्टं री।।
वदने सति अवरुद्धति कण्ठं
दिवसे अवगुण्ठनमाकण्ठं।
केवलमार्य त्यक्त्वा तत्र
किंञ्चिदपि मया न दृष्टं री।।
वंश पुरातन प्रथानुसरणं
नित्यं मर्यादितमाचरणं।
परिजन सकल भिन्न निर्देश पालने
प्रभवति कष्टं री।।
भर्तुर्पितरौ भगिनी भ्राता
खलु प्रत्येकः क्लेश विधाता।
सहसा प्रियतममुखं विलोक्य तु
सर्वं कष्ट विनिष्टं री।।
अभवत् कठिनं दिवावसानम्
बहु प्रतीक्षितं रजन्यागमनम्।
लज्जया किञ्च कथं कथयानि
विशिष्ट प्रणयपरिशिष्टं री।।
अवश्य जपें अजपा जप............
अवश्य जपें अजपा जप
ॐ श्री महागणेशाय नमः
मानव शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ है । यदि शास्त्र के अनुसार इसका उपयोग किया जाए तो मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है । इसके लिए शास्त्रो मे बहुत से साधन बतलाए गए हैं । उनमे सबसे सुगम साधन है- ' अजपाजप ' । इस साधन से पता चलता है कि जीव पर भगवान की कितनी असीम अनुकंपा है । ' अजपाजप ' का संकल्प कर लेने पर 24 घंटो मे एक क्षण भी व्यर्थ नही हो पाता - चाहे हम जागते हो , स्वप्न मे हों या सुषुप्ती मे , प्रत्येक दशा मे ' हंसः ' * का जप श्वाश क्रिया द्वारा अनायास होता ही रहता है । संकल्प कर देने भर से यह जप मनुष्य द्वारा किया हुआ माना जाता है ।
* हंसः - अग्नि पुराण मे बताया गया है कि श्वाश-प्रश्वाश द्वारा ' हंसः ' , ' सो$हं ' के रूप मे शरीर स्थित ब्रह्म का ही उच्चारण होता रहता है । अतः तत्व वेत्ता इसे ही ' अजपाजप ' कहते हैं ।
मेरे मित्र समूह के सभी सदस्यों से निवेदन है कि वे इस बिना श्रम के ' अजपाजप ' का संकल्प जरूर लें ।
ॐ श्री महागणेशाय नमः
मानव शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ है । यदि शास्त्र के अनुसार इसका उपयोग किया जाए तो मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है । इसके लिए शास्त्रो मे बहुत से साधन बतलाए गए हैं । उनमे सबसे सुगम साधन है- ' अजपाजप ' । इस साधन से पता चलता है कि जीव पर भगवान की कितनी असीम अनुकंपा है । ' अजपाजप ' का संकल्प कर लेने पर 24 घंटो मे एक क्षण भी व्यर्थ नही हो पाता - चाहे हम जागते हो , स्वप्न मे हों या सुषुप्ती मे , प्रत्येक दशा मे ' हंसः ' * का जप श्वाश क्रिया द्वारा अनायास होता ही रहता है । संकल्प कर देने भर से यह जप मनुष्य द्वारा किया हुआ माना जाता है ।
* हंसः - अग्नि पुराण मे बताया गया है कि श्वाश-प्रश्वाश द्वारा ' हंसः ' , ' सो$हं ' के रूप मे शरीर स्थित ब्रह्म का ही उच्चारण होता रहता है । अतः तत्व वेत्ता इसे ही ' अजपाजप ' कहते हैं ।
मेरे मित्र समूह के सभी सदस्यों से निवेदन है कि वे इस बिना श्रम के ' अजपाजप ' का संकल्प जरूर लें ।
Saturday, 4 February 2012
तुलसी’ जे कीरत चहहिं...............
स्नेही स्वजनों सादर मधुर शुभ प्रभात मंगलम !!
महाकवि संत गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है ,
तुलसी’ जे कीरत चहहिं पर की कीरत खोइ !
तिनके मुह मसि लागिहे मिटीह न मरिहे धोई !!
दूसरों की निंदा कर , प्रसंशा पाना या प्रतिष्ठा पाने का अनुभव करने का विचार ही कुत्सित है ! इस प्रकार की अवधारणा रखने वालो के मुख पर ऐसी कालिख लगती है ,जो मिटाए नहीं मिटती !!
साधारण प्राणी अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, वह अपनी सीमाओ को भलीभाँति जानता है ! जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है ! देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत दुर्लभ हैं , पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है ! उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है !
महाकवि संत गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है ,
तुलसी’ जे कीरत चहहिं पर की कीरत खोइ !
तिनके मुह मसि लागिहे मिटीह न मरिहे धोई !!
दूसरों की निंदा कर , प्रसंशा पाना या प्रतिष्ठा पाने का अनुभव करने का विचार ही कुत्सित है ! इस प्रकार की अवधारणा रखने वालो के मुख पर ऐसी कालिख लगती है ,जो मिटाए नहीं मिटती !!
साधारण प्राणी अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, वह अपनी सीमाओ को भलीभाँति जानता है ! जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है ! देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत दुर्लभ हैं , पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है ! उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है !
Wednesday, 1 February 2012
मनुष्य विचारों का पुंज है.............
मनुष्य विचारों का पुंज है। किसी भी व्यक्ति की पहचान किवह सज्जान-दुर्जन, शिष्ट-अशिष्ट, साधु-असाधु, संयमी-असंयमी है, विचारों से ही की जा सकती है। यजुर्वेद में कहा गया है-''आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिद्:।'' इस मंत्र का तात्पर्य यह है कि कल्याणकारी, विघ्नरहित, शुभफलप्रद विचार हमें सभी ओर से प्राप्त हों, जिससे आलस्य रहित और रक्षा करने वाले देवता प्रतिदिन सदा हमारी समृद्धि करे। सद्विचार हमें चारों ओर से प्राप्त हों। शास्त्रों में कहा गया है-'बालादापि शुभषितम्' -अर्थात बालक से भी अच्छी बात ग्रहण करनी चाहिए। मनुष्य जो कुछ मन में सोचता है वही वाणी से कहता है, वैसा ही कर्म करता है, उसी प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार बन जाता है। ऋग्वेद में कहा गया है-''समानो मंत्र: समिति: समानं मन: सह चित्तामेषाम्'' इस मंत्र का आशय यह है कि परमात्मा ने सभी को समान सुविधाएं दी है और समान उपकरण दिए है।
मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे दी गई सुविधाओं का समुचित प्रयोग करते हुए उन्नति करे। इसके लिए विचारों की एकता व भावनाओं का समन्वय आवश्यक है। अथर्ववेद के मंत्रों के माध्यम से कहा गया है कि लक्ष्य की पूर्ति के लिए हृदय की एकता अनिवार्य है तथा संकल्प, विचार और उद्देश्य भी समान होना आवश्यक है। समाज को सुसंगठित करने के लिए समान विचार, समान कर्म और समान लक्ष्य, इन तीन तत्वों की आवश्यकता होती है। यह भावना सद्विचारों से ही आ सकती है। शुभ विचारों से ही एक-दूसरे के हित-चिंतन की भावना उत्पन्न कर समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हुआ जा सकता है। मनुस्मृति के अनुसार जल से शरीर शुद्ध होता है। विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है। हम शरीर के साथ-साथ मन, आत्मा व बुद्धि को शुद्ध रखेंगे तो हमारे विचार स्वत: ही शुभ हो जाएंगे। मानव-जीवन अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए है। अभ्युदय का अभिप्राय है-सांसारिक उन्नति, सांसारिक सुख व वैभव। नि:श्रेयस का अर्थ मोक्ष के सुख से है। मनुष्य का मन शुभ विचारों से युक्त होने पर व्यक्ति आनंदित होता है। मनुष्य के उत्थान में विचारों का अत्यंत महत्व है। उत्ताम व शुभ विचार मनुष्य को निरंतर प्रगति के मार्ग पर ले जाते है।
मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे दी गई सुविधाओं का समुचित प्रयोग करते हुए उन्नति करे। इसके लिए विचारों की एकता व भावनाओं का समन्वय आवश्यक है। अथर्ववेद के मंत्रों के माध्यम से कहा गया है कि लक्ष्य की पूर्ति के लिए हृदय की एकता अनिवार्य है तथा संकल्प, विचार और उद्देश्य भी समान होना आवश्यक है। समाज को सुसंगठित करने के लिए समान विचार, समान कर्म और समान लक्ष्य, इन तीन तत्वों की आवश्यकता होती है। यह भावना सद्विचारों से ही आ सकती है। शुभ विचारों से ही एक-दूसरे के हित-चिंतन की भावना उत्पन्न कर समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हुआ जा सकता है। मनुस्मृति के अनुसार जल से शरीर शुद्ध होता है। विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है। हम शरीर के साथ-साथ मन, आत्मा व बुद्धि को शुद्ध रखेंगे तो हमारे विचार स्वत: ही शुभ हो जाएंगे। मानव-जीवन अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए है। अभ्युदय का अभिप्राय है-सांसारिक उन्नति, सांसारिक सुख व वैभव। नि:श्रेयस का अर्थ मोक्ष के सुख से है। मनुष्य का मन शुभ विचारों से युक्त होने पर व्यक्ति आनंदित होता है। मनुष्य के उत्थान में विचारों का अत्यंत महत्व है। उत्ताम व शुभ विचार मनुष्य को निरंतर प्रगति के मार्ग पर ले जाते है।
Tuesday, 31 January 2012
आचार्य चाणक्य........
चाणक्य या कहें कि विष्णुगुप्त अथवा कौटिल्य, ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेदों का गहन अध्ययन किया. क्या यह गौरव का विषय नहीं कि दुनियाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय, तक्षशिला और नालन्दा भारतीय उपमहाद्वीप में थे. और हाँ, ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम ५०० से ४०० वर्ष ईसा पूर्व की बात कर रहे हैं. तक्षशिला एक सुस्थापित शिक्षण संस्थान था और माना जाता है कि पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण की रचना यहीं की थी. चाणक्य भी बाद में यहाँ नीतिशास्त्र के व्याख्याता हुए (कुशाग्र छात्र, है न!). ऐसा कहा जाता है कि वे व्यवहारिक उदाहरणों से पढ़ाते थे. यूनानी लोगों के तक्षशिला पर चढ़ाई करने कारण से वहाँ एक राजनैतिक उथल-पुथल मच गयी और चाणक्य को मगध में आकर बसना पड़ा. उन्हें नि:संदेह एक राजा के निर्माता के रूप में अधिक जाना जाता है. चंद्रगुप्त मौर्य विशेष रूप से उनकी सलाह मानते थे. शत्रुओं की कमज़ोरी को पहचाकर उसे अपने काम में लाने की विशिष्ट प्रतिभा के चलते चाणक्य हमेशा अपने शत्रुओं पर हावी रहे. उन्होंने तीन पुस्तकों की रचना की- ‘अर्थशास्त्र‘, ‘नीतिशास्त्र’ तथा ‘चाणक्य नीति’. ‘नीतिशास्त्र’ में भारतीय जीवन के तौर-तरीकों का विवरण है तो ‘चाणक्य नीति’ में उन विचारों का लेखा-जोखा है जिनमें चाणक्य विश्वास करते थे और जिनका वे पालन करते थे.
राष्ट्रीय नीतियों, रणनीतियों तथा विदेशी संबंधो पर लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ उनकी सर्वाधिक विख्यात पुस्तक है. प्रबंधन की दृष्टि से एक राजा तथा प्रशासन की भूमिका तथा कर्तव्यों को यह पुस्तक स्पष्ट करती है. यह पुस्तक एक राज्य के सफल संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिये यह न सिर्फ़ आपदाओं तथा अनाचारों से निपटने की राह बताती है बल्कि अनुशासन तथा नीति-निर्धारण के तरीकों का भी उल्लेख करती है. इसी विषय पर लिखी एक और पुस्तक है ‘द प्रिंस‘ जो कि मैकियावेली द्वारा रचित है, हालांकि विषय समान होते हुए भी यह पुस्तक चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ से सर्वथा भिन्न है. मैकियावेली पन्द्रहवीं शताब्दी के इतालवी राजनैतिक दार्शनिक थे. अपनी सत्ता को का़यम रखने के लिये एक महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी को क्या नीतियाँ अपनानी चाहिये, उनकी किताब इसी विषय पर केंद्रित है. उनके विचार अतिवादी माने जाते हैं क्योंकि उनके मतानुसार तानाशाही राज्य में स्थिरता बनाये रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है. शक्ति तथा सत्ता प्राप्ति को उन्होंने नैतिकता से भी महत्वपूर्ण माना है. लगभग २००० वर्षों के अंतराल वाली इन दो कृतियों की तुलना करना बेहद रोचक है.
दुनियाँ मुख्यत: मैकियावेली को ही जानती है। भारतीय होने के नाते हम कम से कम इतना तो ही कर ही सकते है कि सर झुका कर उस महान शख्सियत को नमन करें जिसका नाम था - चाणक्य।
[संपादित करें]चाणक्य की कुटिया
पाटलिपुत्र के अमात्य आचार्य चाणक्य बहुत विद्वान न्यायप्रिय होने के साथ एक सीधे सादे ईमानदार सज्जन व्यक्ति भी थे। वे इतने बडे साम्राज्य के महामंत्री होने के बावजूद छप्पर से ढकी कुटिया में रहते थे। एक आम आदमी की तरह उनका रहन-सहन था। एक बार यूनान का राजदूत उनसे मिलने राज दरबार में पहुंचा राजनीति और कूटनय में दक्ष चाणक्य की चर्चा सुनकर राजदूत मंत्रमुग्ध हो गया। राजदूत ने शाम को चाणक्य से मिलने का समय मांगा। आचार्य ने कहा-आप रात को मेरे घर आ सकते हैं। राजदूत चाणक्य के व्यवहार से प्रसन्न हुआ। शाम को जब वह राजमहल परिसर में ’आमात्य निवास‘ के बारे में पूछने लगा। राज प्रहरी ने बताया- आचार्य चाणक्य तो नगर के बाहर रहते हैं। राजदूत ने सोचा शायद महामंत्री का नगर के बाहर सरोवर पर बना सुंदर महल होगा। राजदूत नगर के बाहर पहूंचा। एक नागरिक से पूछा कि चाणक्य कहा रहते हैं। एक कुटिया की ओर इशारा करते हुए नागरिक ने कहा-देखिए, वह सामने महामंत्री की कुटिया है। राजदूत आश्चर्य चकित रह गया। उसने कुटिया में पहुंचकर चाणक्य के पांव छुए और शिकायत की-आप जैसा चतुर महामंत्री एक कुटिया में रहता है। चाणक्य ने कहा-अगर मै जनता की कडी मेहनत और पसीने की कमाई से बने महलों से रहूंगा तो मेरे देश के नागरिक को कुटिया भी नसीब नहीं होगी। चाणक्य की ईमानदारी पर यूनान का राजदूत नतमस्तक हो गया।
[संपादित करें]चाणक्य नीति-दर्पण
नीतिवर्णन परत्व संस्कृत ग्रंथो में, चाणक्य-नीतिदर्पण का महत्वपूर्ण स्थान है । जीवन को सुखमय एवं ध्येयपूर्ण बनाने के लिए, नाना विषयों का वर्णन इसमें सूत्रात्मक शैली से सुबोध रूप में प्राप्त होता है । व्यवहार संबंधी सूत्रों के साथ-साथ, राजनीति संबंधी श्लोकों का भी इनमें समावेश होता है । आचार्य चाणक्य भारत का महान गौरव है, और उनके इतिहास पर भारत को गर्व है । तो इससे पूर्व कि हम नीति-दर्पण की ओर बढें, चलिए पहले इस महान शिक्षक, प्रखर राजनीतिज्ञ एवं अर्थशास्त्रकार के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करें ।प्राचीन संस्कृत शास्त्रज्ञों की परंपरा में, आचार्य चणक के पुत्र विष्णुगुप्त-चाणक्य का स्थान विशेष है । वे गुणवान, राजनीति कुशल, आचार और व्यवहार में मर्मज्ञ, कूटनीति के सूक्ष्मदर्शी प्रणेता, और अर्थशास्त्र के विद्वान माने जाते हैं ।
वे स्वभाव से स्वाभिमानी, चारित्र्यवान तथा संयमी; स्वरुप से कुरूप; बुद्धि से तीक्ष्ण; इरादे के पक्के; प्रतिभा के धनी, युगदृष्टा और युगसृष्टा थे । कर्तव्य की वेदी पर मन की मधुर भावनाओं की बली देनेवाले वे धैर्यमूर्ति थे ।
चाणक्य का समय ई.स. पूर्व ३२६ वर्ष का माना जाता है । अपने निवासस्थान पाटलीपुत्र (पट़ना) से तक्षशीला प्रस्थान कर उन्होंने वहाँ विद्या प्राप्त की । अपने प्रौढ़ज्ञान से विद्वानों को प्रसन्न कर वे वहीं पर राजनीति के प्राध्यापक बने । लेकिन उनका जीवन, सदा आत्मनिरिक्षण में मग्न रहता था । देश की दुर्व्यवस्था देखकर उनका हृदय अस्वस्थ हो उठता; कलुषित राजनीति और सांप्रदायिक मनोवृत्ति से त्रस्त भारत का पतन उनसे सहन नहीं हो पाता था । अतः अपनी दूरदर्शी सोच से, एक विस्तृत योजना बनाकर, देश को एकसूत्र में बाँधने का असामान्य प्रयास उन्होंने किया ।
भारत के अनेक जनपदों में वे घूमें । जनसामान्य से लेकर, शिक्षकों एवं सम्राटों तक में सोयी हुई राष्ट्र-निष्ठा को उन्होंने जागृत किया । इस राजकीय एवं सांस्कृतिक क्रांति को स्थिर करने, अपने गुणवान और पराक्रमी शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर स्थापित किया । चाणक्य याने स्वार्थत्याग, निर्भीकता, साहस एवं विद्वत्ता की साक्षात् मूरत !
मगध के महामंत्री होने पर भी वे सामान्य कुटिया में रहते थे । चीन के प्रसिद्ध यात्री फाह्यान ने यह देखकर जब आश्चर्य व्यक्त किया, तब महामंत्री का उत्तर था "जिस देश का महामंत्री (प्रधानमंत्री-प्रमुख) सामान्य कुटिया में रहता है, वहाँ के नागरिक भव्य भवनों में निवास करते हैं; पर जिस देश के मंत्री महालयों में निवास करते हैं, वहाँ की जनता कुटिया में रहती है । राजमहल की अटारियों में, जनता की पीडा का आर्तनाद सुनायी नहीं देता ।”
चाणक्य का मानना था कि `बुद्धिर्यस्य बलं तस्य`। वे पुरुषार्थवादी थे; `दैवाधीनं जगत्सर्वम्` इस सिद्धांत को मानने के लिए कदापि तैयार नहीं थे । सार्वजनिन हित और महान ध्येय की पूर्ति में प्रजातंत्र या लोकशिक्षण अनिवार्य है, पर पर्याप्त नहीं ऐसा उनका स्पष्ट मत था । देश के शिक्षक, विद्वान और रक्षक – निःस्पृही, चतुर और साहसी होने चाहिए । स्वजीवन और समाजव्यवहार में उन्नत नीतिमूल्य का आचरण ही श्रेष्ठ है; किंतु, स्वार्थपरायण सत्तावान या वित्तवानों से, आवश्यकता पडने पर वज्रकुटिल बनना चाहिए – ऐसा उनका मत था । इसी कारण वे “कौटिल्य” कहलाये ।
चाणक्य का व्यक्तित्व शिक्षकों तथा राजनीतिज्ञों के लिए किसी भी काल में तथा किसी भी देश में अनुकरणीय एवं आदर्श है । उनके चरित्र की महानता के पीछे, उनकी कर्मनिष्ठा, अतुलप्रज्ञा और दृढप्रतिज्ञा थे । वे मेधा, त्याग, तेजस्विता, दृढता, साहस एवं पुरुषार्थ के प्रतीक हैं । उनके अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र के सिद्धांत अर्वाचीन काल में भी उतने ही उपयुक्त हैं । चाणक्य-नीतिदर्पण ग्रंथ में, आचार्य ने अपने पूर्वजों द्वारा संभाली धरोहर का और अन्य वैदिक ग्रंथो का अध्ययन कर, सूत्रों एवं श्लोकों का संकलन किया है । उन्हें, आने वाले समय में सुसंस्कृत पर क्रमशः प्रस्तुत करने का हमें हर्ष है । स्मृतिरुप होने के कारण, कुछ एक रचनाओं को काल एवं परिस्थिति अनुसार यथोचित न्याय और संदर्भ देने का प्रयास अनिवार्य होगा; अन्यथा आचार्य के कथन का अपप्रयोग हो पाना अत्यंत संभव है । अस्तु ।
[संपादित करें]मूल चाणक्य नीति
आज से करीब 2300 साल पहले पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में चाणक्य का अहम योगदान रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आगे दिए जा रहीं उनकी कुछ बातें भी चाणक्य नीति की इसी विशेषता के दर्शन होते हैं :
- किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।
- अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
- सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।
- हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।
- अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।
- दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।
- ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
- नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।
- जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।
- असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
- संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।
- भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।
- कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।
आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।
5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।
6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।
7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।
13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
16. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
1७. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
1८. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
[संपादित करें]चाणक्य की सीख
चाणक्य एक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहते थे। वहां अनेक लोग उनसे परामर्श और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। जिस जंगल में वह रहते थे, वह पत्थरों और कंटीली झाडि़यों से भरा था। चूंकि उस समय प्राय: नंगे पैर रहने का ही चलन था, इसलिए उनके निवास तक पहुंचने में लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते-पहुंचते लोगों के पांव लहूलुहान हो जाते थे।
एक दिन कुछ लोग उस मार्ग से बेहद परेशानियों का सामना कर चाणक्य तक पहुंचे। एक व्यक्ति उनसे निवेदन करते हुए बोला, ‘आपके पास पहुंचने में हम लोगों को बहुत कष्ट हुआ। आप महाराज से कहकर यहां की जमीन को चमड़े से ढकवाने की व्यवस्था करा दें। इससे लोगों को आराम होगा।’ उसकी बात सुनकर चाणक्य मुस्कराते हुए बोले, ‘महाशय, केवल यहीं चमड़ा बिछाने से समस्या हल नहीं होगी। कंटीले व पथरीले पथ तो इस विश्व में अनगिनत हैं। ऐसे में पूरे विश्व में चमड़ा बिछवाना तो असंभव है। हां, यदि आप लोग चमड़े द्वारा अपने पैरों को सुरक्षित कर लें तो अवश्य ही पथरीले पथ व कंटीली झाडि़यों के प्रकोप से बच सकते हैं।’ वह व्यक्ति सिर झुकाकर बोला, ‘हां गुरुजी, मैं अब ऐसा ही करूंगा।’
इसके बाद चाणक्य बोले, ‘देखो, मेरी इस बात के पीछे भी गहरा सार है। दूसरों को सुधारने के बजाय खुद को सुधारो। इससे तुम अपने कार्य में विजय अवश्य हासिल कर लोगे। दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका स्वयं पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है।’ इस बात से सभी सहमत हो गए।
[संपादित करें]कौटिल्य अर्थशास्त्र
पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही भारत तथा पाश्चात्य देशों में हलचल-सी मच गई क्योंकि इसमें शासन-विज्ञान के उन अद्भुत तत्त्वों का वर्णन पाया गया, जिनके सम्बन्ध में भारतीयों को सर्वथा अनभिज्ञ समझा जाता था। पाश्चात्य विद्वान फ्लीट, जौली आदि ने इस पुस्तक को एक ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण’ ग्रंथ बतलाया और इसे भारत के प्राचीन इतिहास के निर्माण में परम सहायक साधन स्वीकार किया। इस पुस्तक की रचना आचार्य विष्णुगुप्त ने की, जिसे कौटिल्य और चाणक्य नामों से भी स्मरण किया जाता है। पुस्तक की समाप्ति पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है।
‘‘प्राय: भाष्यकारों का शास्त्रों के अर्थ में परस्पर मतभेद देखकर विष्णुगुप्त ने स्वयं ही सूत्रों को लिखा और स्वयं ही उनका भाष्य भी किया।’’ (15/1)
साथ ही यह भी लिखा गया है:
‘‘इस शास्त्र (अर्थशास्त्र) का प्रणयन उसने किया है, जिसने अपने क्रोध द्वारा नन्दों के राज्य को नष्ट करके शास्त्र, शस्त्र और भूमि का उद्धार किया।’ (15/1)
विष्णु पुराण में इस घटना की चर्चा इस तरह की गई है: ‘‘महापदम-नन्द नाम का एक राजा था। उसके नौ पुत्रों ने सौ वर्षों तक राज्य किया। उन नन्दों को कौटिल्य नाम के ब्राह्मण ने मार दिया। उनकी मृत्यु के बाद मौर्यों ने पृथ्वी पर राज्य किया और कौटिल्य ने स्वयं प्रथम चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक किया। चन्द्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार हुआ और बिन्दुसार का पुत्र अशोकवर्धन हुआ।’’ (4/24)
‘नीतिसार’ के कर्ता कामन्दक ने भी घटना की पुष्टि करते हुए लिखा है: ‘‘इन्द्र के समान शक्तिशाली आचार्य विष्णुगुप्त ने अकेले ही वज्र-सदृश अपनी मन्त्र-शक्ति द्वारा पर्वत-तुल्य महाराज नन्द का नाश कर दिया और उसके स्थान पर मनुष्यों में चन्द्रमा के समान चन्द्रगुप्त को पृथ्वी के शासन पर अधिष्ठित किया।’’
इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि विष्णुगुप्त और कौटिल्य एक ही व्यक्ति थे। ‘अर्थशास्त्र’ में ही द्वितीय अधिकरण के दशम अध्याय के अन्त में पुस्तक के रचयिता का नाम ‘कौटिल्य’ बताया गया है:
‘‘सब शास्त्रों का अनुशीलन करके और उनका प्रयोग भी जान करके कौटिल्य ने राजा (चन्द्रगुप्त) के लिए इस शासन-विधि (अर्थशास्त्र) का निर्माण किया है।’’ (2/10)
पुस्तक के आरम्भ में ‘कौटिल्येन कृतं शास्त्रम्’ तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘इति कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे’ लिखकर ग्रन्थकार ने अपने ‘कौटिल्य नाम को अधिक विख्यात किया है। जहां-जहां अन्य आचार्यों के मत का प्रतिपादन किया है, अन्त में ‘इति कौटिल्य’ अर्थात् कौटिल्य का मत है-इस तरह कहकर कौटिल्य नाम के लिए अपना अधिक पक्षपात प्रदर्शित किया है। परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य अभिन्न व्यक्ति थे। उत्तरकालीन दण्डी कवि ने इसे आचार्य विष्णुगुप्त नाम से यदि कहा है, तो बाणभट्ट ने इसे ही कौटिल्य नाम से पुकारा है। दोनों का कथन है कि इस आचार्य ने ‘दण्डनीति’ अथवा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की।
पञ्चतन्त्र में इसी आचार्य का नाम चाणक्य दिया गया है, जो अर्थशास्त्र का रचयिता है। कवि विशाखदत्त-प्रणीत सुप्रसिद्ध नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में चाणक्य को कभी कौटिल्य तथा कभी विष्णुगुप्त नाम से सम्बोधित किया गया है। कहते हैं कि अन्तिम महाराज नन्द (योगानन्द) ने अपनी मन्त्री शकटार को श्राद्ध के लिए ब्राह्मणों को एकत्र करने के लिए कहा। शकटार राजा द्वारा पूर्व में किए गए किसी अपमान से पीड़ित था। उसने एक ऐसे क्रोधी ब्राह्मण को ढूंढ़ना शुरू किया, जो श्राद्ध में उपस्थित होकर राजा को अपने ब्रह्मतेज से भस्म कर दे। खोज करते हुए उसने एक कुरूप, कृष्णकाय ब्राह्मण को देखा, जो किसी जंगल में कांटेदार झाड़ियों को काट रहा था और उनकी जड़ों में खट्टा दही डाल रहा था। शकटार द्वारा इसका कारण पूछे जाने पर उस ब्राह्मण ने कहा, ‘‘इन झाड़ियों के कांटों के चुभने से मेरे पिता का देहान्त हुआ अत: मैं इन्हें समूचा नष्ट कर रहा हूं।’’
इस क्रोधी ब्राह्मण को शकटार ने उपयुक्त, निमन्त्रण-योग्य ब्राह्मण जाना और उससे महाराज नन्द द्वारा आयोजित ब्रह्मभोज में उपस्थित होने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने इस निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
नियत समय पर जब वह ब्राह्मण ब्रह्मभोज के लिए उपस्थित हुआ, मन्त्री शकटार ने आदरपूर्वक उसे सर्वप्रथम आसन पर विराजमान किया। ब्रह्मभोज आरम्भ होने पर जब महाराज नन्द ब्राह्मणों का दर्शन करने के लिए आए तो सर्वप्रथम एक कुरूप कृष्णकाय, भीषण व्यक्ति को देखकर अति क्रुद्ध होकर कहने लगे, ‘‘इस चाण्डाल को ब्रह्मभोज में क्यों लाया गया है ?’’ ब्राह्मण इस अपमान को सहन न कर सका और उसने भोजन छोड़कर तत्काल अपनी शिखा खोलते हुए यह प्रतिज्ञा की : ‘‘जब तक मैं नन्द वंश को समूल नष्ट करके अपने इस अपमान का बदला नहीं ले लूंगा, तब तक मैं शिखा-बन्धन न करूंगा।’’ ऐसी गर्जना करता हुआ वह ब्राह्मण ब्रह्मभोज से उठकर चला गया। शकटार अपनी इच्छा को पूर्ण होता हुआ देखकर अति प्रसन्न हुआ।
इसी ब्राह्मण ने, जो चाणक्य था, अपनी मन्त्रशक्ति द्वारा अकेले ही नन्द राजाओं का नाश किया और मौर्य चन्द्रगुप्त को, जो स्वयं अपने पिता नन्द द्वारा अपमानित होकर राज्य पर अधिकार करने की चिन्ता में था, भारतवर्ष के प्रथम सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित किया। भारत उस समय जनपदों में बंटा हुआ था, जिनपर छोटे-छोटे राजा लोग शासन करते थे। चाणक्य ने उन सबको मौर्य चन्द्रगुप्त के अधीन किया और पहली बार भारत को एक साम्राज्य में संगठित किया। इसी साम्राज्य को चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक ने धर्म-विजयों द्वारा अफगानिस्तान से दक्षिण तक और बंगाल से काठियावाड़ तक विस्तृत किया। इन्हीं मौर्य सम्राटों द्वारा वस्तुत: भारत का एकराष्ट्र रूप सर्वप्रथम विकसित हुआ, जिसका मूल श्रेय उसी नीति-विशारद, कूटनीतिज्ञ, दूरद्रष्टा ब्राह्मण को है, जिसे कौटिल्य, चाणक्य या विष्णुगुप्त नामों से कहा गया है।
‘अर्थशास्त्र’ की रचना ‘शासन-विधि’ के रूप में प्रथम मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के लिए की गई। अत: इसकी रचना का काल वही मानना उचित है, जो सम्राट चन्द्रगुप्त का काल है। पुरातत्त्ववेत्ता विद्वानों ने यह काल 321 ई.पू. से 296 ई.पू.तक निश्चित किया है। कई अन्य विद्वान सम्राट सेण्ड्राकोटस (जो यूनानी इतिहास में सम्राट चन्द्रगुप्त का पर्यायवाची है) के आधार पर निश्चित की हुई इस तिथि को स्वीकार नहीं करते।
इस ‘अर्थशास्त्र’ का विषय क्या है ? जैसे ऊपर कहा गया है-इसका मुख्य विषय शासन-विधि अथवा शासन-विज्ञान है: ‘‘कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधि: कृत:।’’ इन शब्दों से स्पष्ट है कि आचार्य ने इसकी रचना राजनीति-शास्त्र तथा विशेषतया शासन-प्रबन्ध की विधि के रूप में की। अर्थशास्त्र की विषय-सूची को देखने से (जहां अमात्योत्पत्ति, मन्त्राधिकार, दूत-प्रणिधि, अध्यक्ष-नियुक्ति, दण्डकर्म, षाड्गुण्यसमुद्देश्य, राजराज्ययो: व्यसन-चिन्ता, बलोपादान-काल, स्कन्धावार-निवेश, कूट-युद्ध, मन्त्र-युद्ध इत्यादि विषयों का उल्लेख है) यह सर्वथा प्रमाणित हो जाता है कि इसे आजकल कहे जाने वाले अर्थशास्त्र (इकोनोमिक्स) की पुस्तक कहना भूल है। प्रथम अधिकरण के प्रारम्भ में ही स्वयं आचार्य ने इसे दण्ड नीति नाम से सूचित किया
शुक्राचार्य ने दण्डनीति को इतनी महत्त्वपूर्ण विद्या बतलाया है कि इसमें अन्य सब विद्याओं का अन्तर्भाव मान लिया है-क्योंकि ‘शस्त्रेण रक्षिते देशे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते’ की उक्ति के अनुसार शस्त्र (दण्ड) द्वारा सुशासित तथा सुरक्षित देश में ही वेद आदि अन्य शास्त्रों की चिन्ता या अनुशीलन हो सकता है। अत: दण्डनीति को अन्य सब विद्याओं की आधारभूत विद्या के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है, और वही दण्डनीति अर्थशास्त्र है।
जिसे आजकल अर्थशास्त्र कहा जाता है, उसके लिए 'वार्ता' शब्द का प्रयोग किया गया है, यद्यपि यह शब्द पूर्णतया अर्थशास्त्र का द्योतक नहीं। कौटिल्य ने वार्ता के तीन अंग कहे हैं-कृषि, वाणिज्य तथा पशु-पालन, जिनसे प्राय: वृत्ति या जीविका का उपार्जन किया जाता था। मनु, याज्ञवल्क्य आदि शास्त्रकारों ने भी इन तीन अंगों वाले वार्ताशास्त्र को स्वीकार किया है। पीछे शुक्राचार्य ने इस वार्ता में कुसीद (बैंकिग) को भी वृत्ति के साधन-रूप में सम्मिलित कर दिया है। परन्तु अर्थशास्त्र को सभी शास्त्रकारों ने दण्डनीति, राजनीति अथवा शासनविज्ञान के रूप में ही वर्णित किया है। अत: ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को राजनीति की पुस्तक समझना ही ठीक होगा न कि सम्पत्तिशास्त्र की पुस्तक। वैसे इसमें कहीं-कहीं सम्पत्तिशास्त्र के धनोत्पादन, धनोपभोग तथा धन-विनिमय, धन-विभाजन आदि विषयों की भी प्रासंगिक चर्चा की गई है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण का प्रारम्भिक वचन इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डालने वाला है:
पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्ये: प्रस्तावितानि,
प्रायश: तानि संहृत्य एकमिदमर्थशास्त्र कृतम्।
अर्थात्-प्राचीन आचार्यों ने पृथ्वी जीतने और पालन के उपाय बतलाने वाले जितने अर्थशास्त्र लिखे हैं, प्रायः उन सबका सार लेकर इस एक अर्थशास्त्र का निर्माण किया गया है।
यह उद्धरण अर्थशास्त्र के विषय को जहां स्पष्ट करता है, वहां इस सत्य को भी प्रकाशित करता है कि ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ से पूर्व अनेक आचार्यों ने अर्थशास्त्र की रचनाएं कीं, जिनका उद्देश्य पृथ्वी-विजय तथा उसके पालन के उपायों का प्रतिपादन करना था। उन आचार्यों ने अर्थशास्त्र की रचनाएं कीं, जिनका उद्देश्य पृथ्वी-विजय तथा उसके पालन के उपायों का प्रतिपादन करना था। उन आचार्यों तथा उनके सम्प्रदायों के कुछ नामों का निर्देशन ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में किया गया है, यद्यपि उनकी कृतियां आज उपलब्ध भी नहीं होतीं। ये नाम निम्नलिखित है:
(1) मानव-मनु के अनुयायी
(2) बार्हस्पत्य-बृहस्पति के अनुगामी
(3) औशनस-उशना अथवा शुक्राचार्य के मतानुयायी
(4) भारद्वाज (द्रोणाचार्य)
(5) विशालाक्ष
(6) पराशर
(7) पिशुन (नारद)
(8) कौणपदन्त (भीष्म)
(9) वाताव्याधि (उद्धव)
(10) बाहुदन्ती-पुत्र (इन्द्र)।
अर्थशास्त्र के इन दस सम्प्रदायों के आचार्यों में प्राय: सभी के सम्बन्ध में कुछ-न-कुछ ज्ञात है, परन्तु विशालाक्ष के बारे में बहुत कम परिचय प्राप्त होता है। इन नामों से यह तो अत्यन्त स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र के प्रति अनेक महान विचारकों तथा दार्शनिकों का ध्यान गया और इस विषय पर एक उज्जवल साहित्य का निर्माण हुआ। आज वह साहित्य लुप्त हो चुका है। अनेक विदेशी आक्रमणों तथा राज्यक्रान्तियों के कारण इस साहित्य का नाम-मात्र शेष रह गया है, परन्तु जितना भी साहित्य अवशिष्ट है वह एक विस्तृत अर्थशास्त्रीय परम्परा का संकेत करता है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में इन पूर्वाचार्यों के विभिन्न मतों का स्थान-स्थान पर संग्रह किया गया है और उनके शासन-सम्बन्धी सिद्धान्तों का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
इस अर्थशा्स्त्र में एक ऐसी शासन-पद्धति का विधान किया गया है जिसमें राजा या शासक प्रजा का कल्याण सम्पादन करने के लिए शासन करता है। राजा स्वेच्छाचारी होकर शासन नहीं कर सकता। उसे मन्त्रिपरिषद् की सहायता प्राप्त करके ही प्रजा पर शासन करना होता है। राज्य-पुरोहित राजा पर अंकुश के समान है, जो धर्म-मार्ग से च्युत होने पर राजा का नियन्त्रण कर सकता है और उसे कर्तव्य-पालन के लिए विवश कर सकता है।
सर्वलोकहितकारी राष्ट्र का जो स्वरूप कौटिल्य को अभिप्रेत है, वह ‘अर्थशास्त्र’ के निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है-
प्रजा सुखे सुखं राज्ञ: प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञ: प्रजानां तु प्रियं प्रियम्।। (1/19)
अर्थात्-प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजाके हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय (स्वार्थ) कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।
[संपादित करें]चाणक्य और मकियावेली
यह सत्य है कि कौटिल्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए गुप्त प्रणिधियों के एक विशाल संगठन का वर्णन किया है। शत्रुनाश के लिए विषकन्या, गणिका, औपनिषदिक प्रयोग, अभिचार मंत्र आदि अनैतिक एवं अनुचित उपायों का विधान है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महान धन-व्यय तथा धन-क्षय को भी (सुमहताऽपि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्य:) राष्ट्र-नीति के अनुकूल घोषित किया है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में ऐसी चर्चाओं को देखकर ही मुद्राराक्षसकार कवि विशाखादत्त चाणक्य को कुटिलमति (कौटिल्य: कुटिलमतिः) कहा है और बाणभट्ट ने ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को ‘निर्गुण’ तथा ‘अतिनृशंसप्रायोपदेशम्’ (निर्दयता तथा नृशंसता का उपदेश देने वाला) कहकर निन्दित बतलाया है। 'मञ्जुश्री मूलकल्प' नाम की एक नवीन उपलब्ध ऐतिहासिक कृति में कौटिल्य को ‘दुर्मति’, क्रोधन और ‘पापक’ पुकारकर गर्हा का पात्र प्रदर्शित किया गया है।
प्राच्यविद्या के विशेषज्ञ अनेक आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने भी उपर्युक्त अनैतिक व्यवस्थाओं को देखकर कौटिल्य की तुलना यूरोप के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिज्ञ मेकियावली से की है, जिसने अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स’ में राजा को लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उचित अनुचित सभी साधनों का आश्रय लेने का उपदेश दिया है। विण्टरनिट्ज आदि पाश्चात्य विद्वान् कौटिल्य तथा मेकियावली में निम्नलिखित समानताएं प्रदर्शित करते हैं:
(क) मेकियावली और कौटिल्य दोनों राष्ट्र को ही सब कुछ समझते हैं। वे राष्ट्र को अपने में ही उद्देश्य मानते हैं।
(ख) कौटिल्य-नीति का मुख्य आधार है, ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की अभिवृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।
(ग) अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किसी भी साधन, नैतिक या अनैतिक, का आश्रय लेना अनुचित नहीं है। मेकियावली और कौटिल्य दोनों का मत है कि साध्य को सिद्ध करना ही राजा का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। साधनों के औचित्य या अनौचित्य की उसे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
(घ) दोनों युद्ध को राष्ट्र-नीति का आवश्यक अंग मानते हैं। दोनों की सम्मति में प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध के लिए उद्यत रहना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा देश की सीमा तथा प्रभाव का विस्तार हो सकता है।
(ङ) अपनी प्रजा में आतंक स्थापित करके दृढ़ता तथा निर्दयता से उस पर शासन करना दोनों एक समान प्रतिपादित करते हैं। दोनों एक विशाल सुसंगठित गुप्तचर विभाग की स्थापना का समर्थन करते हैं, जो प्रजा के प्रत्येक पार्श्व में प्रवेश करके राजा के प्रति उसकी भक्ति की परीक्षा करे और शत्रु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को गुप्त उपायों से नष्ट करने का यत्न करे।
हमारी सम्पति में कौटिल्य तथा मेकियावली में ऐसी सदृशता दिखाना युक्तिसंगत नहीं। निस्सन्देह कौटिल्य भी मेकियावली के समान यथार्थवादी था और केवल आदर्शवाद का अनुयायी न था। परन्तु यह कहना कि कौटिल्य ने धर्म या नैतिकता को सर्वथा तिलांञ्जलि दे दी थी, सत्यता के विपरीत होगा। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में ही स्थापना की है;
तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।
स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति।। (1/3)
अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
इसी प्रथम अधिकरण में ही राजा द्वारा अमर्यादाओं को व्यवस्थित करने पर भी बल दिया गया है और वर्ण तथा आश्रम-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आदेश दिया गया है। यहां पर त्रयी तथा वैदिक अनुष्ठान को प्रजा के संरक्षण का मूल आधार बतलाया गया है। कौटिल्य ने स्थान-स्थान पर राजा को वृद्धों की संगत करने वाला, विद्या से विनम्र, जितेन्द्रिय और काम-क्रोध आदि शत्रु-षड्वर्ग का दमन करने वाला कहा है। ऐसा राजा अधार्मिक अथवा अत्याचारी बनकर किस प्रकार प्रजा-पीड़न कर सकता है ? इसके विपरीत राजा को प्रजा के लिए पितृ-तुल्य कहा गया है, जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण, संवर्धन, संरक्षण, भरण, शिक्षण इत्यादि वैसा ही करता है जैसा वह अपनी सन्तान का करता है।
यह ठीक है कि कौटिल्य ने शत्रुनाश के लिए अनैतिक उपायों के करने का भी उपदेश दिया है। परन्तु इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के निम्न वचन को नहीं भूलना चाहिए:
एवं दूष्येषु अधार्मिकेषु वर्तेत, न इतरेषु। (5/2)
अर्थात्- इन कूटनीति के उपायों का व्यवहार केवल अधार्मिक एवं दुष्ट लोगों के साथ ही करे,
राष्ट्रीय नीतियों, रणनीतियों तथा विदेशी संबंधो पर लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ उनकी सर्वाधिक विख्यात पुस्तक है. प्रबंधन की दृष्टि से एक राजा तथा प्रशासन की भूमिका तथा कर्तव्यों को यह पुस्तक स्पष्ट करती है. यह पुस्तक एक राज्य के सफल संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिये यह न सिर्फ़ आपदाओं तथा अनाचारों से निपटने की राह बताती है बल्कि अनुशासन तथा नीति-निर्धारण के तरीकों का भी उल्लेख करती है. इसी विषय पर लिखी एक और पुस्तक है ‘द प्रिंस‘ जो कि मैकियावेली द्वारा रचित है, हालांकि विषय समान होते हुए भी यह पुस्तक चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ से सर्वथा भिन्न है. मैकियावेली पन्द्रहवीं शताब्दी के इतालवी राजनैतिक दार्शनिक थे. अपनी सत्ता को का़यम रखने के लिये एक महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी को क्या नीतियाँ अपनानी चाहिये, उनकी किताब इसी विषय पर केंद्रित है. उनके विचार अतिवादी माने जाते हैं क्योंकि उनके मतानुसार तानाशाही राज्य में स्थिरता बनाये रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है. शक्ति तथा सत्ता प्राप्ति को उन्होंने नैतिकता से भी महत्वपूर्ण माना है. लगभग २००० वर्षों के अंतराल वाली इन दो कृतियों की तुलना करना बेहद रोचक है.
दुनियाँ मुख्यत: मैकियावेली को ही जानती है। भारतीय होने के नाते हम कम से कम इतना तो ही कर ही सकते है कि सर झुका कर उस महान शख्सियत को नमन करें जिसका नाम था - चाणक्य।
[संपादित करें]चाणक्य की कुटिया
पाटलिपुत्र के अमात्य आचार्य चाणक्य बहुत विद्वान न्यायप्रिय होने के साथ एक सीधे सादे ईमानदार सज्जन व्यक्ति भी थे। वे इतने बडे साम्राज्य के महामंत्री होने के बावजूद छप्पर से ढकी कुटिया में रहते थे। एक आम आदमी की तरह उनका रहन-सहन था। एक बार यूनान का राजदूत उनसे मिलने राज दरबार में पहुंचा राजनीति और कूटनय में दक्ष चाणक्य की चर्चा सुनकर राजदूत मंत्रमुग्ध हो गया। राजदूत ने शाम को चाणक्य से मिलने का समय मांगा। आचार्य ने कहा-आप रात को मेरे घर आ सकते हैं। राजदूत चाणक्य के व्यवहार से प्रसन्न हुआ। शाम को जब वह राजमहल परिसर में ’आमात्य निवास‘ के बारे में पूछने लगा। राज प्रहरी ने बताया- आचार्य चाणक्य तो नगर के बाहर रहते हैं। राजदूत ने सोचा शायद महामंत्री का नगर के बाहर सरोवर पर बना सुंदर महल होगा। राजदूत नगर के बाहर पहूंचा। एक नागरिक से पूछा कि चाणक्य कहा रहते हैं। एक कुटिया की ओर इशारा करते हुए नागरिक ने कहा-देखिए, वह सामने महामंत्री की कुटिया है। राजदूत आश्चर्य चकित रह गया। उसने कुटिया में पहुंचकर चाणक्य के पांव छुए और शिकायत की-आप जैसा चतुर महामंत्री एक कुटिया में रहता है। चाणक्य ने कहा-अगर मै जनता की कडी मेहनत और पसीने की कमाई से बने महलों से रहूंगा तो मेरे देश के नागरिक को कुटिया भी नसीब नहीं होगी। चाणक्य की ईमानदारी पर यूनान का राजदूत नतमस्तक हो गया।
[संपादित करें]चाणक्य नीति-दर्पण
नीतिवर्णन परत्व संस्कृत ग्रंथो में, चाणक्य-नीतिदर्पण का महत्वपूर्ण स्थान है । जीवन को सुखमय एवं ध्येयपूर्ण बनाने के लिए, नाना विषयों का वर्णन इसमें सूत्रात्मक शैली से सुबोध रूप में प्राप्त होता है । व्यवहार संबंधी सूत्रों के साथ-साथ, राजनीति संबंधी श्लोकों का भी इनमें समावेश होता है । आचार्य चाणक्य भारत का महान गौरव है, और उनके इतिहास पर भारत को गर्व है । तो इससे पूर्व कि हम नीति-दर्पण की ओर बढें, चलिए पहले इस महान शिक्षक, प्रखर राजनीतिज्ञ एवं अर्थशास्त्रकार के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करें ।प्राचीन संस्कृत शास्त्रज्ञों की परंपरा में, आचार्य चणक के पुत्र विष्णुगुप्त-चाणक्य का स्थान विशेष है । वे गुणवान, राजनीति कुशल, आचार और व्यवहार में मर्मज्ञ, कूटनीति के सूक्ष्मदर्शी प्रणेता, और अर्थशास्त्र के विद्वान माने जाते हैं ।
वे स्वभाव से स्वाभिमानी, चारित्र्यवान तथा संयमी; स्वरुप से कुरूप; बुद्धि से तीक्ष्ण; इरादे के पक्के; प्रतिभा के धनी, युगदृष्टा और युगसृष्टा थे । कर्तव्य की वेदी पर मन की मधुर भावनाओं की बली देनेवाले वे धैर्यमूर्ति थे ।
चाणक्य का समय ई.स. पूर्व ३२६ वर्ष का माना जाता है । अपने निवासस्थान पाटलीपुत्र (पट़ना) से तक्षशीला प्रस्थान कर उन्होंने वहाँ विद्या प्राप्त की । अपने प्रौढ़ज्ञान से विद्वानों को प्रसन्न कर वे वहीं पर राजनीति के प्राध्यापक बने । लेकिन उनका जीवन, सदा आत्मनिरिक्षण में मग्न रहता था । देश की दुर्व्यवस्था देखकर उनका हृदय अस्वस्थ हो उठता; कलुषित राजनीति और सांप्रदायिक मनोवृत्ति से त्रस्त भारत का पतन उनसे सहन नहीं हो पाता था । अतः अपनी दूरदर्शी सोच से, एक विस्तृत योजना बनाकर, देश को एकसूत्र में बाँधने का असामान्य प्रयास उन्होंने किया ।
भारत के अनेक जनपदों में वे घूमें । जनसामान्य से लेकर, शिक्षकों एवं सम्राटों तक में सोयी हुई राष्ट्र-निष्ठा को उन्होंने जागृत किया । इस राजकीय एवं सांस्कृतिक क्रांति को स्थिर करने, अपने गुणवान और पराक्रमी शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर स्थापित किया । चाणक्य याने स्वार्थत्याग, निर्भीकता, साहस एवं विद्वत्ता की साक्षात् मूरत !
मगध के महामंत्री होने पर भी वे सामान्य कुटिया में रहते थे । चीन के प्रसिद्ध यात्री फाह्यान ने यह देखकर जब आश्चर्य व्यक्त किया, तब महामंत्री का उत्तर था "जिस देश का महामंत्री (प्रधानमंत्री-प्रमुख) सामान्य कुटिया में रहता है, वहाँ के नागरिक भव्य भवनों में निवास करते हैं; पर जिस देश के मंत्री महालयों में निवास करते हैं, वहाँ की जनता कुटिया में रहती है । राजमहल की अटारियों में, जनता की पीडा का आर्तनाद सुनायी नहीं देता ।”
चाणक्य का मानना था कि `बुद्धिर्यस्य बलं तस्य`। वे पुरुषार्थवादी थे; `दैवाधीनं जगत्सर्वम्` इस सिद्धांत को मानने के लिए कदापि तैयार नहीं थे । सार्वजनिन हित और महान ध्येय की पूर्ति में प्रजातंत्र या लोकशिक्षण अनिवार्य है, पर पर्याप्त नहीं ऐसा उनका स्पष्ट मत था । देश के शिक्षक, विद्वान और रक्षक – निःस्पृही, चतुर और साहसी होने चाहिए । स्वजीवन और समाजव्यवहार में उन्नत नीतिमूल्य का आचरण ही श्रेष्ठ है; किंतु, स्वार्थपरायण सत्तावान या वित्तवानों से, आवश्यकता पडने पर वज्रकुटिल बनना चाहिए – ऐसा उनका मत था । इसी कारण वे “कौटिल्य” कहलाये ।
चाणक्य का व्यक्तित्व शिक्षकों तथा राजनीतिज्ञों के लिए किसी भी काल में तथा किसी भी देश में अनुकरणीय एवं आदर्श है । उनके चरित्र की महानता के पीछे, उनकी कर्मनिष्ठा, अतुलप्रज्ञा और दृढप्रतिज्ञा थे । वे मेधा, त्याग, तेजस्विता, दृढता, साहस एवं पुरुषार्थ के प्रतीक हैं । उनके अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र के सिद्धांत अर्वाचीन काल में भी उतने ही उपयुक्त हैं । चाणक्य-नीतिदर्पण ग्रंथ में, आचार्य ने अपने पूर्वजों द्वारा संभाली धरोहर का और अन्य वैदिक ग्रंथो का अध्ययन कर, सूत्रों एवं श्लोकों का संकलन किया है । उन्हें, आने वाले समय में सुसंस्कृत पर क्रमशः प्रस्तुत करने का हमें हर्ष है । स्मृतिरुप होने के कारण, कुछ एक रचनाओं को काल एवं परिस्थिति अनुसार यथोचित न्याय और संदर्भ देने का प्रयास अनिवार्य होगा; अन्यथा आचार्य के कथन का अपप्रयोग हो पाना अत्यंत संभव है । अस्तु ।
[संपादित करें]मूल चाणक्य नीति
आज से करीब 2300 साल पहले पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में चाणक्य का अहम योगदान रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आगे दिए जा रहीं उनकी कुछ बातें भी चाणक्य नीति की इसी विशेषता के दर्शन होते हैं :
- किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।
- अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
- सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।
- हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।
- अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।
- दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।
- ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
- नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।
- जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।
- असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
- संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।
- भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।
- कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।
आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।
5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।
6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।
7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।
13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
16. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
1७. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
1८. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
[संपादित करें]चाणक्य की सीख
चाणक्य एक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहते थे। वहां अनेक लोग उनसे परामर्श और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। जिस जंगल में वह रहते थे, वह पत्थरों और कंटीली झाडि़यों से भरा था। चूंकि उस समय प्राय: नंगे पैर रहने का ही चलन था, इसलिए उनके निवास तक पहुंचने में लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते-पहुंचते लोगों के पांव लहूलुहान हो जाते थे।
एक दिन कुछ लोग उस मार्ग से बेहद परेशानियों का सामना कर चाणक्य तक पहुंचे। एक व्यक्ति उनसे निवेदन करते हुए बोला, ‘आपके पास पहुंचने में हम लोगों को बहुत कष्ट हुआ। आप महाराज से कहकर यहां की जमीन को चमड़े से ढकवाने की व्यवस्था करा दें। इससे लोगों को आराम होगा।’ उसकी बात सुनकर चाणक्य मुस्कराते हुए बोले, ‘महाशय, केवल यहीं चमड़ा बिछाने से समस्या हल नहीं होगी। कंटीले व पथरीले पथ तो इस विश्व में अनगिनत हैं। ऐसे में पूरे विश्व में चमड़ा बिछवाना तो असंभव है। हां, यदि आप लोग चमड़े द्वारा अपने पैरों को सुरक्षित कर लें तो अवश्य ही पथरीले पथ व कंटीली झाडि़यों के प्रकोप से बच सकते हैं।’ वह व्यक्ति सिर झुकाकर बोला, ‘हां गुरुजी, मैं अब ऐसा ही करूंगा।’
इसके बाद चाणक्य बोले, ‘देखो, मेरी इस बात के पीछे भी गहरा सार है। दूसरों को सुधारने के बजाय खुद को सुधारो। इससे तुम अपने कार्य में विजय अवश्य हासिल कर लोगे। दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका स्वयं पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है।’ इस बात से सभी सहमत हो गए।
[संपादित करें]कौटिल्य अर्थशास्त्र
पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही भारत तथा पाश्चात्य देशों में हलचल-सी मच गई क्योंकि इसमें शासन-विज्ञान के उन अद्भुत तत्त्वों का वर्णन पाया गया, जिनके सम्बन्ध में भारतीयों को सर्वथा अनभिज्ञ समझा जाता था। पाश्चात्य विद्वान फ्लीट, जौली आदि ने इस पुस्तक को एक ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण’ ग्रंथ बतलाया और इसे भारत के प्राचीन इतिहास के निर्माण में परम सहायक साधन स्वीकार किया। इस पुस्तक की रचना आचार्य विष्णुगुप्त ने की, जिसे कौटिल्य और चाणक्य नामों से भी स्मरण किया जाता है। पुस्तक की समाप्ति पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है।
‘‘प्राय: भाष्यकारों का शास्त्रों के अर्थ में परस्पर मतभेद देखकर विष्णुगुप्त ने स्वयं ही सूत्रों को लिखा और स्वयं ही उनका भाष्य भी किया।’’ (15/1)
साथ ही यह भी लिखा गया है:
‘‘इस शास्त्र (अर्थशास्त्र) का प्रणयन उसने किया है, जिसने अपने क्रोध द्वारा नन्दों के राज्य को नष्ट करके शास्त्र, शस्त्र और भूमि का उद्धार किया।’ (15/1)
विष्णु पुराण में इस घटना की चर्चा इस तरह की गई है: ‘‘महापदम-नन्द नाम का एक राजा था। उसके नौ पुत्रों ने सौ वर्षों तक राज्य किया। उन नन्दों को कौटिल्य नाम के ब्राह्मण ने मार दिया। उनकी मृत्यु के बाद मौर्यों ने पृथ्वी पर राज्य किया और कौटिल्य ने स्वयं प्रथम चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक किया। चन्द्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार हुआ और बिन्दुसार का पुत्र अशोकवर्धन हुआ।’’ (4/24)
‘नीतिसार’ के कर्ता कामन्दक ने भी घटना की पुष्टि करते हुए लिखा है: ‘‘इन्द्र के समान शक्तिशाली आचार्य विष्णुगुप्त ने अकेले ही वज्र-सदृश अपनी मन्त्र-शक्ति द्वारा पर्वत-तुल्य महाराज नन्द का नाश कर दिया और उसके स्थान पर मनुष्यों में चन्द्रमा के समान चन्द्रगुप्त को पृथ्वी के शासन पर अधिष्ठित किया।’’
इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि विष्णुगुप्त और कौटिल्य एक ही व्यक्ति थे। ‘अर्थशास्त्र’ में ही द्वितीय अधिकरण के दशम अध्याय के अन्त में पुस्तक के रचयिता का नाम ‘कौटिल्य’ बताया गया है:
‘‘सब शास्त्रों का अनुशीलन करके और उनका प्रयोग भी जान करके कौटिल्य ने राजा (चन्द्रगुप्त) के लिए इस शासन-विधि (अर्थशास्त्र) का निर्माण किया है।’’ (2/10)
पुस्तक के आरम्भ में ‘कौटिल्येन कृतं शास्त्रम्’ तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘इति कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे’ लिखकर ग्रन्थकार ने अपने ‘कौटिल्य नाम को अधिक विख्यात किया है। जहां-जहां अन्य आचार्यों के मत का प्रतिपादन किया है, अन्त में ‘इति कौटिल्य’ अर्थात् कौटिल्य का मत है-इस तरह कहकर कौटिल्य नाम के लिए अपना अधिक पक्षपात प्रदर्शित किया है। परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य अभिन्न व्यक्ति थे। उत्तरकालीन दण्डी कवि ने इसे आचार्य विष्णुगुप्त नाम से यदि कहा है, तो बाणभट्ट ने इसे ही कौटिल्य नाम से पुकारा है। दोनों का कथन है कि इस आचार्य ने ‘दण्डनीति’ अथवा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की।
पञ्चतन्त्र में इसी आचार्य का नाम चाणक्य दिया गया है, जो अर्थशास्त्र का रचयिता है। कवि विशाखदत्त-प्रणीत सुप्रसिद्ध नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में चाणक्य को कभी कौटिल्य तथा कभी विष्णुगुप्त नाम से सम्बोधित किया गया है। कहते हैं कि अन्तिम महाराज नन्द (योगानन्द) ने अपनी मन्त्री शकटार को श्राद्ध के लिए ब्राह्मणों को एकत्र करने के लिए कहा। शकटार राजा द्वारा पूर्व में किए गए किसी अपमान से पीड़ित था। उसने एक ऐसे क्रोधी ब्राह्मण को ढूंढ़ना शुरू किया, जो श्राद्ध में उपस्थित होकर राजा को अपने ब्रह्मतेज से भस्म कर दे। खोज करते हुए उसने एक कुरूप, कृष्णकाय ब्राह्मण को देखा, जो किसी जंगल में कांटेदार झाड़ियों को काट रहा था और उनकी जड़ों में खट्टा दही डाल रहा था। शकटार द्वारा इसका कारण पूछे जाने पर उस ब्राह्मण ने कहा, ‘‘इन झाड़ियों के कांटों के चुभने से मेरे पिता का देहान्त हुआ अत: मैं इन्हें समूचा नष्ट कर रहा हूं।’’
इस क्रोधी ब्राह्मण को शकटार ने उपयुक्त, निमन्त्रण-योग्य ब्राह्मण जाना और उससे महाराज नन्द द्वारा आयोजित ब्रह्मभोज में उपस्थित होने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने इस निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
नियत समय पर जब वह ब्राह्मण ब्रह्मभोज के लिए उपस्थित हुआ, मन्त्री शकटार ने आदरपूर्वक उसे सर्वप्रथम आसन पर विराजमान किया। ब्रह्मभोज आरम्भ होने पर जब महाराज नन्द ब्राह्मणों का दर्शन करने के लिए आए तो सर्वप्रथम एक कुरूप कृष्णकाय, भीषण व्यक्ति को देखकर अति क्रुद्ध होकर कहने लगे, ‘‘इस चाण्डाल को ब्रह्मभोज में क्यों लाया गया है ?’’ ब्राह्मण इस अपमान को सहन न कर सका और उसने भोजन छोड़कर तत्काल अपनी शिखा खोलते हुए यह प्रतिज्ञा की : ‘‘जब तक मैं नन्द वंश को समूल नष्ट करके अपने इस अपमान का बदला नहीं ले लूंगा, तब तक मैं शिखा-बन्धन न करूंगा।’’ ऐसी गर्जना करता हुआ वह ब्राह्मण ब्रह्मभोज से उठकर चला गया। शकटार अपनी इच्छा को पूर्ण होता हुआ देखकर अति प्रसन्न हुआ।
इसी ब्राह्मण ने, जो चाणक्य था, अपनी मन्त्रशक्ति द्वारा अकेले ही नन्द राजाओं का नाश किया और मौर्य चन्द्रगुप्त को, जो स्वयं अपने पिता नन्द द्वारा अपमानित होकर राज्य पर अधिकार करने की चिन्ता में था, भारतवर्ष के प्रथम सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित किया। भारत उस समय जनपदों में बंटा हुआ था, जिनपर छोटे-छोटे राजा लोग शासन करते थे। चाणक्य ने उन सबको मौर्य चन्द्रगुप्त के अधीन किया और पहली बार भारत को एक साम्राज्य में संगठित किया। इसी साम्राज्य को चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक ने धर्म-विजयों द्वारा अफगानिस्तान से दक्षिण तक और बंगाल से काठियावाड़ तक विस्तृत किया। इन्हीं मौर्य सम्राटों द्वारा वस्तुत: भारत का एकराष्ट्र रूप सर्वप्रथम विकसित हुआ, जिसका मूल श्रेय उसी नीति-विशारद, कूटनीतिज्ञ, दूरद्रष्टा ब्राह्मण को है, जिसे कौटिल्य, चाणक्य या विष्णुगुप्त नामों से कहा गया है।
‘अर्थशास्त्र’ की रचना ‘शासन-विधि’ के रूप में प्रथम मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के लिए की गई। अत: इसकी रचना का काल वही मानना उचित है, जो सम्राट चन्द्रगुप्त का काल है। पुरातत्त्ववेत्ता विद्वानों ने यह काल 321 ई.पू. से 296 ई.पू.तक निश्चित किया है। कई अन्य विद्वान सम्राट सेण्ड्राकोटस (जो यूनानी इतिहास में सम्राट चन्द्रगुप्त का पर्यायवाची है) के आधार पर निश्चित की हुई इस तिथि को स्वीकार नहीं करते।
इस ‘अर्थशास्त्र’ का विषय क्या है ? जैसे ऊपर कहा गया है-इसका मुख्य विषय शासन-विधि अथवा शासन-विज्ञान है: ‘‘कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधि: कृत:।’’ इन शब्दों से स्पष्ट है कि आचार्य ने इसकी रचना राजनीति-शास्त्र तथा विशेषतया शासन-प्रबन्ध की विधि के रूप में की। अर्थशास्त्र की विषय-सूची को देखने से (जहां अमात्योत्पत्ति, मन्त्राधिकार, दूत-प्रणिधि, अध्यक्ष-नियुक्ति, दण्डकर्म, षाड्गुण्यसमुद्देश्य, राजराज्ययो: व्यसन-चिन्ता, बलोपादान-काल, स्कन्धावार-निवेश, कूट-युद्ध, मन्त्र-युद्ध इत्यादि विषयों का उल्लेख है) यह सर्वथा प्रमाणित हो जाता है कि इसे आजकल कहे जाने वाले अर्थशास्त्र (इकोनोमिक्स) की पुस्तक कहना भूल है। प्रथम अधिकरण के प्रारम्भ में ही स्वयं आचार्य ने इसे दण्ड नीति नाम से सूचित किया
शुक्राचार्य ने दण्डनीति को इतनी महत्त्वपूर्ण विद्या बतलाया है कि इसमें अन्य सब विद्याओं का अन्तर्भाव मान लिया है-क्योंकि ‘शस्त्रेण रक्षिते देशे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते’ की उक्ति के अनुसार शस्त्र (दण्ड) द्वारा सुशासित तथा सुरक्षित देश में ही वेद आदि अन्य शास्त्रों की चिन्ता या अनुशीलन हो सकता है। अत: दण्डनीति को अन्य सब विद्याओं की आधारभूत विद्या के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है, और वही दण्डनीति अर्थशास्त्र है।
जिसे आजकल अर्थशास्त्र कहा जाता है, उसके लिए 'वार्ता' शब्द का प्रयोग किया गया है, यद्यपि यह शब्द पूर्णतया अर्थशास्त्र का द्योतक नहीं। कौटिल्य ने वार्ता के तीन अंग कहे हैं-कृषि, वाणिज्य तथा पशु-पालन, जिनसे प्राय: वृत्ति या जीविका का उपार्जन किया जाता था। मनु, याज्ञवल्क्य आदि शास्त्रकारों ने भी इन तीन अंगों वाले वार्ताशास्त्र को स्वीकार किया है। पीछे शुक्राचार्य ने इस वार्ता में कुसीद (बैंकिग) को भी वृत्ति के साधन-रूप में सम्मिलित कर दिया है। परन्तु अर्थशास्त्र को सभी शास्त्रकारों ने दण्डनीति, राजनीति अथवा शासनविज्ञान के रूप में ही वर्णित किया है। अत: ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को राजनीति की पुस्तक समझना ही ठीक होगा न कि सम्पत्तिशास्त्र की पुस्तक। वैसे इसमें कहीं-कहीं सम्पत्तिशास्त्र के धनोत्पादन, धनोपभोग तथा धन-विनिमय, धन-विभाजन आदि विषयों की भी प्रासंगिक चर्चा की गई है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण का प्रारम्भिक वचन इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डालने वाला है:
पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्ये: प्रस्तावितानि,
प्रायश: तानि संहृत्य एकमिदमर्थशास्त्र कृतम्।
अर्थात्-प्राचीन आचार्यों ने पृथ्वी जीतने और पालन के उपाय बतलाने वाले जितने अर्थशास्त्र लिखे हैं, प्रायः उन सबका सार लेकर इस एक अर्थशास्त्र का निर्माण किया गया है।
यह उद्धरण अर्थशास्त्र के विषय को जहां स्पष्ट करता है, वहां इस सत्य को भी प्रकाशित करता है कि ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ से पूर्व अनेक आचार्यों ने अर्थशास्त्र की रचनाएं कीं, जिनका उद्देश्य पृथ्वी-विजय तथा उसके पालन के उपायों का प्रतिपादन करना था। उन आचार्यों ने अर्थशास्त्र की रचनाएं कीं, जिनका उद्देश्य पृथ्वी-विजय तथा उसके पालन के उपायों का प्रतिपादन करना था। उन आचार्यों तथा उनके सम्प्रदायों के कुछ नामों का निर्देशन ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में किया गया है, यद्यपि उनकी कृतियां आज उपलब्ध भी नहीं होतीं। ये नाम निम्नलिखित है:
(1) मानव-मनु के अनुयायी
(2) बार्हस्पत्य-बृहस्पति के अनुगामी
(3) औशनस-उशना अथवा शुक्राचार्य के मतानुयायी
(4) भारद्वाज (द्रोणाचार्य)
(5) विशालाक्ष
(6) पराशर
(7) पिशुन (नारद)
(8) कौणपदन्त (भीष्म)
(9) वाताव्याधि (उद्धव)
(10) बाहुदन्ती-पुत्र (इन्द्र)।
अर्थशास्त्र के इन दस सम्प्रदायों के आचार्यों में प्राय: सभी के सम्बन्ध में कुछ-न-कुछ ज्ञात है, परन्तु विशालाक्ष के बारे में बहुत कम परिचय प्राप्त होता है। इन नामों से यह तो अत्यन्त स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र के प्रति अनेक महान विचारकों तथा दार्शनिकों का ध्यान गया और इस विषय पर एक उज्जवल साहित्य का निर्माण हुआ। आज वह साहित्य लुप्त हो चुका है। अनेक विदेशी आक्रमणों तथा राज्यक्रान्तियों के कारण इस साहित्य का नाम-मात्र शेष रह गया है, परन्तु जितना भी साहित्य अवशिष्ट है वह एक विस्तृत अर्थशास्त्रीय परम्परा का संकेत करता है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में इन पूर्वाचार्यों के विभिन्न मतों का स्थान-स्थान पर संग्रह किया गया है और उनके शासन-सम्बन्धी सिद्धान्तों का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
इस अर्थशा्स्त्र में एक ऐसी शासन-पद्धति का विधान किया गया है जिसमें राजा या शासक प्रजा का कल्याण सम्पादन करने के लिए शासन करता है। राजा स्वेच्छाचारी होकर शासन नहीं कर सकता। उसे मन्त्रिपरिषद् की सहायता प्राप्त करके ही प्रजा पर शासन करना होता है। राज्य-पुरोहित राजा पर अंकुश के समान है, जो धर्म-मार्ग से च्युत होने पर राजा का नियन्त्रण कर सकता है और उसे कर्तव्य-पालन के लिए विवश कर सकता है।
सर्वलोकहितकारी राष्ट्र का जो स्वरूप कौटिल्य को अभिप्रेत है, वह ‘अर्थशास्त्र’ के निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है-
प्रजा सुखे सुखं राज्ञ: प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञ: प्रजानां तु प्रियं प्रियम्।। (1/19)
अर्थात्-प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजाके हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय (स्वार्थ) कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।
[संपादित करें]चाणक्य और मकियावेली
यह सत्य है कि कौटिल्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए गुप्त प्रणिधियों के एक विशाल संगठन का वर्णन किया है। शत्रुनाश के लिए विषकन्या, गणिका, औपनिषदिक प्रयोग, अभिचार मंत्र आदि अनैतिक एवं अनुचित उपायों का विधान है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महान धन-व्यय तथा धन-क्षय को भी (सुमहताऽपि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्य:) राष्ट्र-नीति के अनुकूल घोषित किया है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में ऐसी चर्चाओं को देखकर ही मुद्राराक्षसकार कवि विशाखादत्त चाणक्य को कुटिलमति (कौटिल्य: कुटिलमतिः) कहा है और बाणभट्ट ने ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को ‘निर्गुण’ तथा ‘अतिनृशंसप्रायोपदेशम्’ (निर्दयता तथा नृशंसता का उपदेश देने वाला) कहकर निन्दित बतलाया है। 'मञ्जुश्री मूलकल्प' नाम की एक नवीन उपलब्ध ऐतिहासिक कृति में कौटिल्य को ‘दुर्मति’, क्रोधन और ‘पापक’ पुकारकर गर्हा का पात्र प्रदर्शित किया गया है।
प्राच्यविद्या के विशेषज्ञ अनेक आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने भी उपर्युक्त अनैतिक व्यवस्थाओं को देखकर कौटिल्य की तुलना यूरोप के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिज्ञ मेकियावली से की है, जिसने अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स’ में राजा को लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उचित अनुचित सभी साधनों का आश्रय लेने का उपदेश दिया है। विण्टरनिट्ज आदि पाश्चात्य विद्वान् कौटिल्य तथा मेकियावली में निम्नलिखित समानताएं प्रदर्शित करते हैं:
(क) मेकियावली और कौटिल्य दोनों राष्ट्र को ही सब कुछ समझते हैं। वे राष्ट्र को अपने में ही उद्देश्य मानते हैं।
(ख) कौटिल्य-नीति का मुख्य आधार है, ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की अभिवृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।
(ग) अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किसी भी साधन, नैतिक या अनैतिक, का आश्रय लेना अनुचित नहीं है। मेकियावली और कौटिल्य दोनों का मत है कि साध्य को सिद्ध करना ही राजा का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। साधनों के औचित्य या अनौचित्य की उसे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
(घ) दोनों युद्ध को राष्ट्र-नीति का आवश्यक अंग मानते हैं। दोनों की सम्मति में प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध के लिए उद्यत रहना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा देश की सीमा तथा प्रभाव का विस्तार हो सकता है।
(ङ) अपनी प्रजा में आतंक स्थापित करके दृढ़ता तथा निर्दयता से उस पर शासन करना दोनों एक समान प्रतिपादित करते हैं। दोनों एक विशाल सुसंगठित गुप्तचर विभाग की स्थापना का समर्थन करते हैं, जो प्रजा के प्रत्येक पार्श्व में प्रवेश करके राजा के प्रति उसकी भक्ति की परीक्षा करे और शत्रु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को गुप्त उपायों से नष्ट करने का यत्न करे।
हमारी सम्पति में कौटिल्य तथा मेकियावली में ऐसी सदृशता दिखाना युक्तिसंगत नहीं। निस्सन्देह कौटिल्य भी मेकियावली के समान यथार्थवादी था और केवल आदर्शवाद का अनुयायी न था। परन्तु यह कहना कि कौटिल्य ने धर्म या नैतिकता को सर्वथा तिलांञ्जलि दे दी थी, सत्यता के विपरीत होगा। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में ही स्थापना की है;
तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।
स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति।। (1/3)
अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
इसी प्रथम अधिकरण में ही राजा द्वारा अमर्यादाओं को व्यवस्थित करने पर भी बल दिया गया है और वर्ण तथा आश्रम-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आदेश दिया गया है। यहां पर त्रयी तथा वैदिक अनुष्ठान को प्रजा के संरक्षण का मूल आधार बतलाया गया है। कौटिल्य ने स्थान-स्थान पर राजा को वृद्धों की संगत करने वाला, विद्या से विनम्र, जितेन्द्रिय और काम-क्रोध आदि शत्रु-षड्वर्ग का दमन करने वाला कहा है। ऐसा राजा अधार्मिक अथवा अत्याचारी बनकर किस प्रकार प्रजा-पीड़न कर सकता है ? इसके विपरीत राजा को प्रजा के लिए पितृ-तुल्य कहा गया है, जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण, संवर्धन, संरक्षण, भरण, शिक्षण इत्यादि वैसा ही करता है जैसा वह अपनी सन्तान का करता है।
यह ठीक है कि कौटिल्य ने शत्रुनाश के लिए अनैतिक उपायों के करने का भी उपदेश दिया है। परन्तु इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के निम्न वचन को नहीं भूलना चाहिए:
एवं दूष्येषु अधार्मिकेषु वर्तेत, न इतरेषु। (5/2)
अर्थात्- इन कूटनीति के उपायों का व्यवहार केवल अधार्मिक एवं दुष्ट लोगों के साथ ही करे,
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