बचपन से ही सुनते आए हैं कि देश की सबसे खूबसूरत इमारत ‘ताजमहल’ को शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया है। स्कूल किताबें हों या समाचार-पत्रों के पन्ने, हर जगह यही तथ्य सामने आया है। प्रो. पी. एन. ओक को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था।
निश्चित ही प्रो. ओक के दावों में कुछ दम है और यदि ये सही हैं, तो इस पर हर भारतीय को गौर करना चाहिए तथा उस छुपी हुई हकीकत और तथ्य को दुनिया के सामने लाना चाहिए। प्रो. ओक अपनी पुस्तक ‘ताजमहल- द ट्रू स्टोरी’ (TAJ MAHAL - THE TRUE STORY) में इस बात में विश्वास जताया है कि सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था।
ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर, एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है, जिसे तब ‘तेजो महालय’ कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहां ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।
ओक के अनुसार, शाहजहां के दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने ‘बादशाहनामा’ में मुग़ल बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है। जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी को मृत्यु के बाद मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में अस्थायी तौर पर दफना दिया गया था और उसके छह माह बाद तारीख 15 जमदी-उल-ओवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया। फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए, आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुन: दफनाया गया।
लाहौरी के अनुसार, राजा जयसिंह अपने पुरखों के इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे। लेकिन, बादशाह के दबाव में वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात कि पुष्टि के लिए यहां ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।
यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्राय: मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था। उदाहरनार्थ- हुमायूं, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये गए हैं।
प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है। ‘महल’ शब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता। यहां यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है, वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है। पहला, शाहजहां की पत्नी का नाम ‘मुमताज महल’ कभी नही था, बल्कि उसका नाम ‘मुमताज-उल-ज़मानी’ था और दूसरा, किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज) का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्द्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है।
प्रो. ओक दावा करते हैं कि ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। साथ ही साथ ओक कहते हैं कि मुमताज और शाहजहां की प्रेम कहानी चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहां के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है। इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षत: समर्थन कर रहे हैं। तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
ओक के अनुसार, न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहां के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है। मुमताज की मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था। यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज की मृत्यु के सात साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया। परन्तु, उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नहीं प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों में यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर-शोर से चल रहा था। फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी., जो औरंगजेब के गद्दीनशीं होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहां रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था।
प्रो. ओक बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी विसंगतियों को इंगित करते हैं, जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि ताजमहल विशाल मकबरा न होकर, विशेषत: हिंदू शिव मन्दिर है। आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहां के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुंच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान शिव की मूर्ति, त्रिशूल, कलश आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताजमहल के संबंध में यह आम किंवदंति प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूंद-बूंद कर पानी टपकता रहता है। यदि यह सत्य है, तो पूरे विश्व मे किसी भी कब्र पर बूंद-बूंद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में शिवलिंग पर बूंद-बूंद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है। फिर ताजमहल (मकबरे) में बूंद-बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब?
प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे।
जऱा सोचिये! यदि ओक का अनुसंधान सत्य है, तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, ‘तेजो महालय’ को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहां को क्यों? इससे जुड़ी तमाम यादों का संबंध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों?
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