मनुष्य विचारों का पुंज है। किसी भी व्यक्ति की पहचान किवह सज्जान-दुर्जन, शिष्ट-अशिष्ट, साधु-असाधु, संयमी-असंयमी है, विचारों से ही की जा सकती है। यजुर्वेद में कहा गया है-''आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिद्:।'' इस मंत्र का तात्पर्य यह है कि कल्याणकारी, विघ्नरहित, शुभफलप्रद विचार हमें सभी ओर से प्राप्त हों, जिससे आलस्य रहित और रक्षा करने वाले देवता प्रतिदिन सदा हमारी समृद्धि करे। सद्विचार हमें चारों ओर से प्राप्त हों। शास्त्रों में कहा गया है-'बालादापि शुभषितम्' -अर्थात बालक से भी अच्छी बात ग्रहण करनी चाहिए। मनुष्य जो कुछ मन में सोचता है वही वाणी से कहता है, वैसा ही कर्म करता है, उसी प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार बन जाता है। ऋग्वेद में कहा गया है-''समानो मंत्र: समिति: समानं मन: सह चित्तामेषाम्'' इस मंत्र का आशय यह है कि परमात्मा ने सभी को समान सुविधाएं दी है और समान उपकरण दिए है।
मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे दी गई सुविधाओं का समुचित प्रयोग करते हुए उन्नति करे। इसके लिए विचारों की एकता व भावनाओं का समन्वय आवश्यक है। अथर्ववेद के मंत्रों के माध्यम से कहा गया है कि लक्ष्य की पूर्ति के लिए हृदय की एकता अनिवार्य है तथा संकल्प, विचार और उद्देश्य भी समान होना आवश्यक है। समाज को सुसंगठित करने के लिए समान विचार, समान कर्म और समान लक्ष्य, इन तीन तत्वों की आवश्यकता होती है। यह भावना सद्विचारों से ही आ सकती है। शुभ विचारों से ही एक-दूसरे के हित-चिंतन की भावना उत्पन्न कर समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हुआ जा सकता है। मनुस्मृति के अनुसार जल से शरीर शुद्ध होता है। विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है। हम शरीर के साथ-साथ मन, आत्मा व बुद्धि को शुद्ध रखेंगे तो हमारे विचार स्वत: ही शुभ हो जाएंगे। मानव-जीवन अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए है। अभ्युदय का अभिप्राय है-सांसारिक उन्नति, सांसारिक सुख व वैभव। नि:श्रेयस का अर्थ मोक्ष के सुख से है। मनुष्य का मन शुभ विचारों से युक्त होने पर व्यक्ति आनंदित होता है। मनुष्य के उत्थान में विचारों का अत्यंत महत्व है। उत्ताम व शुभ विचार मनुष्य को निरंतर प्रगति के मार्ग पर ले जाते है।
मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे दी गई सुविधाओं का समुचित प्रयोग करते हुए उन्नति करे। इसके लिए विचारों की एकता व भावनाओं का समन्वय आवश्यक है। अथर्ववेद के मंत्रों के माध्यम से कहा गया है कि लक्ष्य की पूर्ति के लिए हृदय की एकता अनिवार्य है तथा संकल्प, विचार और उद्देश्य भी समान होना आवश्यक है। समाज को सुसंगठित करने के लिए समान विचार, समान कर्म और समान लक्ष्य, इन तीन तत्वों की आवश्यकता होती है। यह भावना सद्विचारों से ही आ सकती है। शुभ विचारों से ही एक-दूसरे के हित-चिंतन की भावना उत्पन्न कर समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील हुआ जा सकता है। मनुस्मृति के अनुसार जल से शरीर शुद्ध होता है। विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है। हम शरीर के साथ-साथ मन, आत्मा व बुद्धि को शुद्ध रखेंगे तो हमारे विचार स्वत: ही शुभ हो जाएंगे। मानव-जीवन अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए है। अभ्युदय का अभिप्राय है-सांसारिक उन्नति, सांसारिक सुख व वैभव। नि:श्रेयस का अर्थ मोक्ष के सुख से है। मनुष्य का मन शुभ विचारों से युक्त होने पर व्यक्ति आनंदित होता है। मनुष्य के उत्थान में विचारों का अत्यंत महत्व है। उत्ताम व शुभ विचार मनुष्य को निरंतर प्रगति के मार्ग पर ले जाते है।
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