स्नेही स्वजनों सादर मधुर शुभ प्रभात मंगलम !!
महाकवि संत गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है ,
तुलसी’ जे कीरत चहहिं पर की कीरत खोइ !
तिनके मुह मसि लागिहे मिटीह न मरिहे धोई !!
दूसरों की निंदा कर , प्रसंशा पाना या प्रतिष्ठा पाने का अनुभव करने का विचार ही कुत्सित है ! इस प्रकार की अवधारणा रखने वालो के मुख पर ऐसी कालिख लगती है ,जो मिटाए नहीं मिटती !!
साधारण प्राणी अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, वह अपनी सीमाओ को भलीभाँति जानता है ! जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है ! देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत दुर्लभ हैं , पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है ! उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है !
महाकवि संत गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है ,
तुलसी’ जे कीरत चहहिं पर की कीरत खोइ !
तिनके मुह मसि लागिहे मिटीह न मरिहे धोई !!
दूसरों की निंदा कर , प्रसंशा पाना या प्रतिष्ठा पाने का अनुभव करने का विचार ही कुत्सित है ! इस प्रकार की अवधारणा रखने वालो के मुख पर ऐसी कालिख लगती है ,जो मिटाए नहीं मिटती !!
साधारण प्राणी अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, वह अपनी सीमाओ को भलीभाँति जानता है ! जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है ! देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत दुर्लभ हैं , पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है ! उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है !
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